समझदारी

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         एक बार लक्ष्मी जी और शनिदेव में इस बात पर बहस हो गई कि उन दोनों में कौन अच्छा ज्यादा अच्छा हैं।दोनों अपने आप को अच्छा साबित करने में लगे थे कि  नारद जी आ गये।उन्होंने नारद जी से पूछा कि हम दोनों में कौन अच्छा हैं ?नारद जी घबरा गये।उन्होंने ने कहा मैं तो स्वयं ही हमेशा प्रश्न करता रहता हूँ ,भला मुझ में इतनी समझ कहाँ कि आपके प्रश्न का जवाब दे सकूँ।
         नारद जी उन्हें ब्रह्मा जी के पास जाने की सलाह देकर वहां से निकल लिए।अब ब्रह्माजी भी उनके सवाल का उत्तर नहीं पाए और उन्होंने उन्हें विष्णु जी के पास भेज दिया।विष्णु जी ने भी इस प्रश्न का उत्तर न देने में ही अपनी भलाई समझते हुए उन्हें महादेव के पास भेज दिया।महादेव जो कि अपने एक भक्त की परीक्षा लेने की सोच ही रहे थे।सो उन्होंने दोनों को पृथ्वी लोक पर एक व्यापारी के यहाँजाने को कहा जो इस समय मुसीबत में था।
          व्यापारी ने दोनोंकी  बात ध्यान पूर्वक सुनी और उनसे प्रार्थना की कि वे दोनों सामने वाले पेड़ की परिक्रमा कर आये ,तब तक मैं आपके प्रश्न का उत्तर सोचता हूँ।दोनों परिक्रमा करके लौटे तो शनिदेव ने कडक आवाज में कहा अब बोल हम दोनों में कौन तुझे ज्यादा अच्छा लगता हैं ?व्यापारी सोचने लगा हे भगवान ! आज तो बुरा फ़सा यदि शनिदेव को अच्छा कहूँ तो लक्ष्मी जी नाराज हो जाएगी और यदि लक्ष्मी जी की तारीफ़ करूँ तो शनिदेव मेरा सर्वनाश कर देगें।
    व्यापारी ने हाथ जोड़ कर कहा प्रभु मुझे तो आप दोनों ही अच्छे लगते हैं।अब तो शनिदेव को क्रोध आ गया वे बोले हमें बेवकूफ बनाता हैं।सही -सही बोल नहीं तो —-व्यापारी ने कहना शुरू किया प्रभु गुस्ताखी माफ़ ,जब आप पेड़ की ओर जा रहे थे तो आप मुझे अच्छे लग रहे थे और जब वापिस आ रहे थे तो लक्ष्मी जी बहुत अच्छी लग रही थी।उसका समझदारी पूर्ण उत्तर सुनकर दोनों प्रसन्न हो गये और उसे आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गये।
             सार यही है कि मुसीबत जाते हुए अच्छी लगती हैं और ख़ुशी आती हुई अच्छी लगती हैं।परन्तु सुख -दुःख में समझदारी पूर्ण व्यवहार करने वाले व्यक्ति पर ईश्वर हमेशा अपनी कृपा बनाये रखते हैं।इसलिए हमें हमेशा अपनी सोच -समझ को ठीक रखना चाहिए।