संकोच

 

    एक रिटार्यड व्यक्ति मॉल में पहली बार घूमने गया।उसके लिए सब कुछ नया था। एक जगह में ही इतनी सारी चीजों को बिकते देख वह उत्साहित हो गया।काफी शोपिंग करने के बाद वह घर जाने के लिए बाहर जाने का रास्ता ढूढने लगा।वह ऊपर से नीचे और अंदर ही गोल -गोल घूमता रहा लेकिन बाहर जाने का रास्ता उसे नहीं मिला।
     उस आदमी को यूहीं चक्कर काटते देख एक सिक्योरटी गार्ड ने उसके पास जाकर पूछा ,क्या मैं आपकी कुछ मदद करूं ?little-man-waving-mall
उसने संकोच के साथ ना कहा।सिक्योरिटी गार्ड जो काफी समय से उसे देख रहा था ,कडक आवाज में बोला बताते हो या नहीं किस इरादे से इधर -उधर घूम रहे हो ?अब तो सारा संकोच छोड़ वह झट से बोल पड़ा .भाई एग्जिट ढूढ़ रहा हूँ।गार्ड ने उसे एग्जिट बताया और वह दो मिनट में ही बाहर आ गया।  बाहर आकर उसने काफ़ी राहत महसूस करने के साथ वह अपने संकोची स्वभाव को भी धिक्कारा जिसके कारण आज उसे इतनी परेशानी से गुजरना पड़ा।हम सब भी अपने जीवन ऐसी गलतियाँ करते है।जैसे कि कई  छात्र कक्षा में टीचर से कोई सवाल करने में संकोच करता है और कई कर्मचारी अपने बॉस से बात करने से बचते है जबकि यदि हम अपना संकोच छोड़ कर सही तरीके से अपनी बात कहते हैं तो अवश्य ही लोग हमें सुनते है।और हमें सही मार्ग दर्शन दिखाते हुए हमारी मदद भी करते है।
    इन्सान की सफलता का राज उसका निः संकोची होना है।लेकिन उसका मतलब ये नहीं की हम अपनी मर्यादा को भूल कर किसी के काम में दखल करे या किसी भी समय किसी से कुछ भी पूछने लग जाए।हमें उचित समय में ही अपनी बात कहनी चाहिए तभी उसकी कद्र होती हैं।
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