विन्रमता

 

         एक क्लब में ऐसी व्यवस्था थी कि सास -बहू को एक साथ सदयस्ता  लेनी पड़ती थी।कई सम्भ्रांत परिवारों की सास -बहू वहां की सदस्य थी। एक बार पिकनिक पर जाते समय एक बस में सासुए और दूसरी में बहुएं जा रही थी कि बहुओ की बस आगे निकल गई।सासुओ को अपना अपमान लगा उन्होंने ड्राइवर को बस आगे रखने को कहा।बहुए भी कहाँ पीछे रहने वाली थी सो उन्होंने अपनी बस फिर आगे करा ली।250610084236hiya_ep40_2
       इस आगे पीछे की दौड़ में सासुओ की बस खाई में गिर गई और सारी सासुए मर गई।घबराकर बहुओ के ड्राइवर ने भी बस रोक दी और वह उन्हें सांत्वना देने के लिए कहना चाहता था कि होनी पर किसी का जोर नहीं।लेकिन बहुओ के चेहरों पर ख़ुशी के भाव देखकर कुछ बोल नहीं पाया।तभी उसकी नजर एक बहू पर पड़ी जो मुहं लटकाए बैठी थी और उसे देखकर लग रहा था कि वह रोने वाली है।उसे लगा शायद इसकी सासु माँ इसे बहुत प्यार करती होगी इसीलिए यह इतनी उदास हो गई है।ड्राइवर ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा ,बेटी दुखी मत हो ,होनी पर किसका जोर है।
        इतना सुनते ही बहू सुबकते हुए बोली यही सोचकर तो मै परेशान हूँ  कि आज मेरी सासु माँ घर क्यों रह गई ? अब तो ड्राइवर सोचने पर विवश हो गया कि ऐसी क्या वजह हो सकती है कि हमारी ये मासूम बच्चियां जो शादी से पहले इतनी भावुक थी कि किसी को जरा सी चोट लग जाये तो सबसे पहले दौड़ जाती थी मदद के लिए।आज अपनी ही सासु माँ के मरने पर खुश हो रही है।
     दरसल यदि हम अपने आप को टटोलें तो जवाब हमें स्वयं मिल जायेगा कि हमारा कठोर व्यवहार ही हमारी मासूम बहुओ के दिल पर इस तरह आघात करता है कि एक दिन ऐसा भी आता है कि उनकी नारी सुलभ कोमल भावनाएं दम तोड़ देती है और वे हमारी मौत पर दुखी होने के बजाए जश्न  मनाने लगती है।
                      विन्रमता ही वह गुण है जिसके बल पर हम गैर को भी अपना बना लेते है।फिर अपनी बहुओ के साथ विन्रमता से पेश आने में कैसा संकोच ? हमारा बडप्पन हमारी विन्रमता में निहित है न कि हुक्म चलाने की प्रव्रति में।हमें कोशिश करके अपने व्यवहार को विन्रम रखना चाहिए ताकि हम प्यार के साथ -साथ सम्मान भी पा सकें।