अहम

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दो प्यारे बच्चे हर तरह से योग्य ,सहज ,सरल ,सबके काम आने वाले पति -पत्नी बनते ही बात -बात पर लड़ने लगे।एक दूसरे के पूरक बनने के बजाय अपनी अपेक्षाओ का बोझ लादने लगे।पति को शिकायत थी कि पत्नी समय पर खाना नहीं बनाती जिसकी वजह से वह अक्सर ऑफिस के लिए लेट हो जाता है। पत्नी अपनी आजादी का रोना रोती कि उसे अपनी इच्छा से कुछ भी करने की इजाजत नहीं है

        कई बार तो अपनी नादानी में वे दूर बैठे अपने माता -पिता को फोन पर अपने जीवनसाथी की कमिया बताने लगते।उनकी बातो से दुखी माँ ने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की ,लेकिन कुछ खास सुधार नहीं हुआ।माँ को एक उपाय सुझा उसने चंद पंक्तिया लिखकर अपने बच्चों को भेज दी
   अहम ने हमको दिया ही क्या है क्यों इसको अपनाये
   कर्तव्यो को याद रखे हम घर को स्वर्ग बनाये
 अधिकारों का रोना कैसा कर्म हो परिचय हमारा
बदले जीवन धारा ,बदले जीवन धारा
एक दूजे पर व्यंग करे क्यों कमियां क्यों गिनवाए
आगे बढ़कर हाथ थाम ले दिल में उसे बसाये
एक दूजे को खुश रखना ही लक्ष्य बने हमारा
बदले जीवन धारा ,बदले जीवन धारा।
         इन शब्दों का बच्चो पर ऐसा असर हुआ कि अब वे दोनों एक दूसरे में सिर्फ खूबियाँ ही देखने लगे और सही मायने में एक दूसरे के पूरक बन गये।पति पत्नी के रिश्ते में अहम की कोई जगह नहीं होती।जब यह दोनों के बीच रहेगा ,आपस में प्यार होते हुए भी चैन से जीने नहीं देगा।