प्रशंसा

 

       एक आश्रम के बाहर बड़ा सा पत्थर पड़ा था।कई लोग उससे टकराए ,किसी की गाड़ी का टायर कट गया तो किसी की साइकिल पलट गयी।सब उस पत्थर को व उस पत्थर को रखने वाले को कोसते और गलियां देते व आगे निकल जाते।एक सब्जी बेचने वाला भी वहां से गुजरा उसके सिर पर सब्जियों से भरा टोकरा था जैसे ही वह पत्थर से टकराया उसकी सारी सब्जियां सड़क पर बिखर गयी।पहले उसने सब्जियां अपने टोकरे में भरी और फिर उस पत्थर को उठाने की कोशिश करने लगा।पत्थर हटाते समय वह केवल यहीं सोच रहा था कि कहीं मेरी तरह किसी और को भी चोट ना लग जाए।आखिर अपने अथक प्रयास से वह उस पत्थर को हटाने में सफल हो गया तो उसने एक कागज देखा जिस पर लिखा था धन्यवाद तुमने बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करने के इरादे से इस भारी पत्थर को हटाया है।इसलिए यह ईनाम स्वीकार करो।उसने जैसे ही कागज को खोला उसमें से एक हजार का नोट मिला।
      हम अपने जीवन में दिखावा तो बहुत करते है लेकिन सही मायने में ऐसा कोई काम नहीं कर पाते जिसके लिए लोग हमें दिल से धन्यवाद कह सके,हमारी प्रशंसा कर सके।हम अच्छे कपडे पहनते है ,अच्छा घर बनाते है ,बड़ी सी गाड़ी रखते है ताकि लोग हमें सराहे।माना कि सजा हुआ घर सजे हुए लोग ,चमचमाती कार सबको बहुत अच्छी लगती है और सब उसकी तारीफ़ भी करते है।लेकिन क्या सही मायने वे हमारी प्रशंसा कर पाते है।जिसके पास ये सारी चीजे है लोग उनसे ईर्ष्या तो कर सकते है उनसे प्यार नहीं करते और प्रशंसा भी मुहं देखी करते है।भले ही हमने यह सब कुछ बहुत मेहनत व ईमानदारी से पाया हो।
      जब तक हम निस्वार्थ भाव से लोगों के काम नहीं आयेगें तब तक हम सच्ची प्रशंसा व लोगों का प्यार पाने काबिल नहीं हो सकते।किसी शहर या प्रान्त पर राज तो अनेक लोगों ने किया है लेकिन पूरी दुनिया के दिलो पर राज करने करने वाले चंद लोग ही है जिन्होंने अपने जीवन में त्याग को अपनाकर दूसरों की भलाई के लिए काम किया और मर कर भी अमर हो गए।लोग उन्हें ही पूजते है जो लोगों के सुख -दुःख में उनके हमदर्द बन उनके साथ होते है।परहित की भावना किसी मिल्कियत की मोहताज नहीं है।इसलिए इसे दिल में आने से मत रोकों।सच्चे हमदर्द बनो और सच्ची प्रशंसा पाओ।