परवरिश

 

        एक जिद्दी ,बिगडैल बच्चा जिससे उसके माता -पिता व संगी -साथी सभी दुखी थे क्योकिं वह हर काम में अपनी बात ही मनवाने की कोशिश करता चाहे उसकी बात सही हो या नहीं।उसके स्कूल से भी अक्सर उसकी शिकायते आती रहती।उसके माता -पिता ने कई बार मनोचिकित्सक से भी उसकी मीटिंग करायी लेकिन कोई खास फर्क नहीं हुआ।उसकी आदतों से दुखी मत पिता ने आखिर उसे गाँव में उसकी नानी घर भेजने का फैसला किया।नानी तो बहुत खुश हो गयी उसकी तो जैसे मुराद पूरी हो गयी वह तो कब से बुला रही थी अपने नाती को।बस उसके माता पिता ही यह सोचकर उसे नहीं भेज रहे थे कि एक तो गाँव में उसकी शिक्षा ठीक से नहीं हो पायेगी और सबसे बड़ा डर की नानी का लाड -प्यार उसे अधिक बिगाड़ देंगा।
    नानी के घर में बच्चे को हर तरह की आजादी के साथ-साथ नाना -नानी का भरपूर प्यार व अटैशन मिला जिससे उसके अंदर मन में पल रहे उपेक्षा के भाव कुछ कम हुए।अब वह सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार करने लगा था ,सबके साथ मिलजुल कर खेलता ,स्कूल में ध्यान से पढ़ता और अध्यापक का कहना मानता।उसके माता पिता जब उससे मिलने आये तो उस दिन उसका रिजल्ट आया था जिसमे उसने 85%मार्क्स के साथ अपनी क्लास में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया था।माता -पिता ने अश्रुमिश्रित ख़ुशी के साथ अपने बेटे को दिल से लगा लिया था।उन्हें समझ आ गया था कि कमी उनके बच्चे में नहीं बल्कि उस परवरिश में थी जो वे उसे दे रहे थे।वे दोनों वर्किंग होने के कारण उसे उतना समय नहीं दे पा रहे थे जितना कि एक बढ़ते हुए बच्चे को पनपने के लिए चाहिए।
     आज एकल परिवार बढ़ गए हैं जिसमें माता -पिता का संतानों पर ज्यादा फोकस हैं अब वे पालक की तरह कम एक मैनेजर की तरह ज्यादा पेश आ रहे हैं।उन्हें मैनर सिखाने के चक्कर में माता -पिता भूल गए हैं बच्चों को थोड़ी आजादी देनी भी जरुरी हैं जिससे कि वे खुद ही कई चीजों को हमारे बिना बताये सीख सके।वैसे भी बच्चे जिस माहौल में रहते उसका ही अनुसरण करते हैं इसलिए बच्चो को ज्यादा आदेश देने के बजाय खुद अच्छा आचरण अपनाना चाहिए ताकि अपने घर में बच्चे कम्फर्टेबिल रहे उन्हें स्कूल से आकर ऐसा ना लगे जैसे एक क्लास से निकले और दूसरी में आ गये।
    हमें अपने बच्चों को अच्छा नागरिक बनाना है तो हमें दिल के रास्ते उनके करीब जाना होगा ,हर समय उपदेश देने से बच्चें चिढ़ने लगते हैं और अपने माता -पिता को परेशान करने में उन्हें आनन्द आने लगता हैं।जब तक बच्चे छोटे होते हैं तो माता -पिता सहन कर लेते हैं लेकिन उनके बड़े होते ही उन्हें अपने बच्चे की ये ही आदतें बुरी लगने लगती हैं और वे उन्हें पीटना शुरू कर देते हैं।मासूम बच्चे समझ ही नहीं पाते कि हमारी जिस आदत को हमारे माता -पिता सबके बीच में बताकर हँसते थे आज अचानक उसी हरकत पर हमारी पिटाई कर देते हैं।धीरे -धीरे बच्चे कुंठित हो जाते है और माता -पिता व बच्चों में एक नदिखने वाली दूरी आ जाती हैं।अंतर्मन में अकेले हुए बच्चे गलत संगति में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं।उनके ऊपर अपने माता पिता के समझाने का कोई असर नहीं होता क्योकिं उनके व्यवहार दुखी हुए बच्चे अपनी ही एक दुनिया बना लेते हैं जिसमे वे वही करते हैं जो उन्हें पसंद हैं।
   यदि हमें आने वाली नयी पीढ़ी को भटकने से रोकना है तो हमें उन्हें ऐसी परवरिश देनी होगी जिसमें बच्चें हमारे प्यार को महसूस करते हुए अपना समुचित विकास कर सके।अपने हर राज व परेशानी को हमारे साथ बाँट सके ताकि हमारे उचित मार्गदर्शन में वे अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ सके।हमें अपने बच्चों को सुख -सुविधाओं के साथ -साथ अपना समय भी देना होगा ताकि बच्चे अपने आपको उपेक्षित महसूस न करें।