तृप्ति

 

  राजा ययाति की अनेको रानियाँ थी और उन्होंने अपने राज्य के चलते बहुत सुख भोगा, जब वे सौ साल के थे तो मृत्यु को सामने पाकर गिडगिडाने लगे कि उन्हें कुछ दिन ओर जीवित रहने दे ताकि वे ओर सुख भोग सके।मृत्यु ने कहा वह कभी खाली नहीं लौट सकती ,यदि तुम्हारी जगह कोई ओर जाने को तैयार हो तो मैं तुम्हें सौ वर्ष और दे दूंगा।राजा ने अपने बड़े बेटे से मृत्यु के साथ जाने को कहा और उसका बेटा ख़ुशी -ख़ुशी पिता के लिए कुर्बान हो गया।इस तरह ययाति एक हजार वर्ष के हो गए वे एक बाद एक करके अपने सारे बेटों को मृत्यु के साथ विदा करते रहे।
   मृत्यु ने सोचा अब तो ययाति अवश्य ही इस जीवन के सुखों को भोग कर तृप्त हो गए होगें सो उसने उन्हें अपने साथ चलने को कहा लेकिन उन्होंने अपने अंतिम बेटे को मृत्यु को सौंपते हुए कुछ दिन और जीने की इच्छा प्रकट की।मृत्यु ने  17वर्षीय बेटे को एक ओर ले जाकर कहा तुम क्यों मेरे साथ जाना चाहते हो अभी तुमने देखा ही क्या है ?बेटे ने मृत्यु से पूछा कि उसकी उम्र कितनी है ?मृत्यु ने बताया कि सौ साल।बेटे ने कहा कि यदि मेरे पिता एक हजार साल जीकर भी तृप्त नहीं हुए तो मैं सौ साल में कैसे तृप्त होऊंगा।अब यदि अतृप्त ही जाना हैं तो फिर अभी क्यों नहीं ?
   हम सब इस ओर पाने की लालसा में ही कब अपना जीवन पूरा कर लेते हैं ,हमें पता ही नहीं चलता।हमारी एक इच्छा पूरी होने से पहले ही दूसरी इच्छा जागृत हो जाती हैं और हम एक अंतहीन तृष्णा के गुलाम हो जाते हैं।हमें अंतर्मन में देखते हुए यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि हमारा जन्म किस उद्देश्य  के लिए हुआ हैं।हमें यह जीवन कुछ निश्चित वर्ष ही जीने के लिए ही मिला हैं , अब यह हम पर निर्भर करता हैं हम अपने जीवन को कैसे जीते हैं ?हम चाहे तो छोटी उम्र पाकर भी कुछ ऐसे अच्छे काम करके जा सकते हैं कि हमारे जाने के बाद भी हम अपने सद्कर्मो के कारण लोगों के दिलों प्यार बनकर जिन्दा रहें।
    यदि हम अपने जीवन में तृप्ति को स्थान दे तो कुछ अच्छे कर्म अवश्य कर जायेगें क्योकिं अतृप्त लोग तो हमेशा अपने स्वार्थ साधने में ही लगे रहते हैं,उन्हें हमेशा ऐसा लगता हैं कि दुनिया में सबके पास बहुत कुछ हैं बस एक वही हैं जिन्हें कुछ नहीं मिला।तृप्ति एक ऐसी साधना हैं जिसे अपनाने के बाद कुछ पाना बाकि नहीं रहता।