इच्छा

 

     एक राजा सारी  सुख -सुविधाओं के बावजूद दुखी रहता था।एक दिन दुखी मन लिए वह टहल रहा था कि उसकी नजर अपने एक नौकर पर पड़ी जो काम करते -करते गाना रहा था और बहुत खुश नजर आ रहा था।राजा ने अपने मंत्री से पूछा यह नौकर काम के दबाव के बाद भी इतना खुश कैसे हो सकता है कि गाना गा रहा है और मस्त दिखाई पड़ता है।मंत्री ने कहा महाराज यह इतना खुश इसलिए है कि यह अभी तक 99 क्लब का सदस्य नहीं बन पाया है।राजा ने पूछा यह 99 क्लब क्या है ?मंत्री ने जवाब दिया महाराज मैं इसे इस क्लब का सदस्य बनाने का प्रयास करता हूँ फिर आप इसी से पूछ लेना कि यह कौन सा क्लब है जिसका सदस्य बनने पर लोग अपना सुकून खो देते है।
   अगले दिन मंत्री ने उस गरीब नौकर के घर के बाहर एक अशर्फियों से भरी थैली रखवा दी।जैसे ही नौकर की नजर उस पर पड़ी वह उसे लेकर अन्दर गया और खोलकर देखा तो उसमें भरी अशर्फिया देखकर खुश होता हुआ बोला आज तो ईश्वर ने मुझ गरीब पर बड़ी कृपा कर दी जो मुझे घर बैठे ही इतना धन मिल गया।हमेशा अपने काम में मस्त रहने वाले नौकर के दिल में धन मिलते ही अनेकों इच्छाएं मचलने लगी उसने एक पल में ही न जाने कितना कुछ सोच लिया कि वह उस धन से क्या -क्या करेगा ?
   अपनी इच्छाओं की पूर्ति के के लिए उसे 100 अशर्फिया काफ़ी लगी।वह उन्हें गिनने लगा कि कितनी है तो वे 99 ही थी।उसने सोचा जहाँ इतने दिनों तक मैंने अपनी इच्छाएं दबा कर रखी कुछ दिन और सही ,मैं एक ओर अशर्फी कमाकर ही अपनी इच्छा पूरी करूँगा।उसने जी तोड़ मेहनत शुरू कर दी अब वह पहले समान न तो गाना गा  पाता और नहीं खुश दिखाई पड़ता  वह किसी तरह मेहनत करके एक अशर्फी लाता और घर की किसी न किसी जरूरत  के लिए उसको खर्च करना पड़ता।अपने परिवार के साथ सुख से रहने वाला इन्सान अब बात -बात पर घर वालों से झगड़ने लगा कि वे उसकी मेहनत के पैसो को उड़ा रहे है।
      एक दिन उसे उदास देखकर राजा ने उससे उसके दुखी होने का कारण पूछा तो उसने रोते हुए कहा महाराज क्या बताऊ मैं अपने परिवार के साथ रुखा -सुखा खाकर भी बहुत खुश था लेकिन जब से मुझे 99 अशर्फियाँ मिली हैं मैंने अपना सुख चैन खो दिया है मैं बस उन्हें 100 करने के जुगाड़ में लग गया हूँ। राजा को अपने दुखी रहने का राज समझ आ गया था।उन्होंने उस दिन से ही अपनी इच्छाओं को सीमित करने का विचार किया और नौकर को भी समझाया कि उसे अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर अपना चैन नहीं खोना चाहिए क्योकिं इच्छाओं का कोई अंत नहीं हैं।एक इच्छा पूरी होने से पहले ही दूसरी जन्म ले लेती है।
      इससे पहले की इच्छाएं हमें अपने वश में कर ले हमें अपनी इच्छाओं को अपने वश में कर लेना चाहिए ताकि वे हम पर हावी होकर वे हमसे हमारा सुकून ,हमारे अपने न छीन ले। वैसे देखा जाए तो बिना इच्छा के इन्सान तरक्की की राह पर नहीं बढ़ सकता लेकिन फिर भी इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसकी असली ख़ुशी अपने परिवार के साथ होने में है न की बहुत सारा धन कमाकर उसे जोड़ने में।इन्सान कितना भी धन जोड़ ले सब यही छूट जाता है साथ जाते है तो वे प्यारे कर्म जब हमारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।इन्सान को अगर इच्छा रखनी है तो वह ऐसी होनी चाहिए कि दूसरे का भी भला हो सके।ताकि यहाँ जाने के बाद भी हम लोगों के दिलों में प्यार का एहसास बन मुस्कराते रहे।