आत्मसंतोष

 

    एक आदमी के यहाँ एक मेमना और गाय व उसका बछड़ा रहता था।एक बार बछड़े ने दुखी होते हुए अपनी माँ से कहा कि हमारे साथ पक्षपात हो रहा है।हमारा मालिक मेमने को माल खिलाता है और आपको सूखी घास देता है ,आप उसे फिर भी दूध देती है और यह दिनभर इधर -उधर कूदता रहता हैउसके किसी काम नहीं आता , तो भी मालिक इसका बहुत ध्यान रखता है।
    गाय ने अपने बच्चे को समझाते हुए कहा ,बेटा हमें जो कुछ भी मिलता है उसमे संतोष करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।और अपने ऊपर किये गए उपकार का बदला जी जान से लौटना चाहिए मालिक हमें घास देता है यह उसका एहसान है हम पर यदि वह चाहे तो हमें घास भी न दे तो भी हम उसका क्या कर लेगे ?तुम दुखी मत होओं मैंने ऐसे कई मेमने आते जाते देखे है इन दस सालो में।बछड़ा माँ की बात से संतुष्ट नहीं हो पाया और दुखी रहने लगा।
    एक दिन घर में आये बहुत से मेहमानों को देखकर बछड़ा बहुत खुश था कि आज तो बहुत माल बनेगे हो सकता है मालिक हमें भी खाने को दे ,तभी उसकी नजर मेमने पर पड़ी उसकी गरदन मालिक के हाथ में थी और उसके बेटे ने एक झटके में उसे काट डाला।बछड़ा बुरी तरह सहम गया और अपनी माँ के पास जाकर उससे लिपटकर रोते हुए बोला कि माँ आप ठीक कह रही थी कि हमें जो मिलता है उसी में खुश रहकर अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला उतारने के लिए अपनी तरफ से बेहतर देने की कोशिश करनी चाहिए।किसी से  मुफ्त की सेवाएं नहीं लेनी चाहिए।
  गाय बहुत खुश थी कि उसके बच्चे ने जीवन का बहुत बड़ा सबक सीख लिया था और अब वह अपनी स्तिथि में खुश रहना सीख गया था।आज हम सब और अधिक पाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है और बहुत सारे सुख साधन जुटाकर भी खुश नहीं है क्योकि हमारा असली सुख हमारा आत्मसंतोष हमारे पास नहीं रहा है।पहले एक कमाता था और दस खाते थे अब दस के दस कमाते है और एक भी चैन से बैठ कर नहीं खा रहा है क्योकिं हमारे पास किसी के लिए समय ही नहीं है।हमें कोशिश करके अपने जीवन में संतोष को स्थान देना चाहिए ताकि मेहनत करके हमने जो कुछ पाया है उसका सुख भी देख सके।कई लोग संतोष को अपनी प्रगति में बाधक मानते है जबकि ऐसा नहीं है यदि हम संतोष के साथ अपने अपने कर्म करते रहे तो हम लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर होते रहते है और अपने जीवन में उन सुखद पलों को भी जी पाते है जो सही मायने में हमारी जीवन शक्ति बनकर हमारे साथ रहते है।संतोष कभी भी किसी को कर्महीन होने के लिए नहीं कहता बल्कि वह तो हमेशा इंसान के अच्छे कर्मो में ही छिपा है।इसलिए हमें हमेशा सद्कर्म करते हुए संतोष के साथ जीवन यापन करना चाहिए।

 

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