बोलने की कला

 

    एक संत जो कि 90 वर्ष के हो चुके थे ,उन्होंने घोषणा की कि वे कल वे जीवित समाधि ले लेगें।शिष्यों ने उनसे कुछ समय ओर  रुकने का अनुरोध किया।गुरु के न मानने पर उन्होंने उनसे जीवन के लिए कोई बहुमूल्य उपदेश देने को कहा।संत ने उनका आग्रह स्वीकारते हुए समाधि के समय ही उपदेश देने को कह।अगले दिन सारे शिष्यों को समाधि स्थल पर एकत्रित देख गुरु जी ने मुंह खोलकर शिष्यों से पूछा कि उन्हें उनके मुंह में क्या दिखाई दे रहा है ?सभी शिष्य एक स्वर में बोले जीभ।
    गुरूजी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जीभ जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ रहती है ,जबकि दांत जन्म के बाद आते है और अक्सर मृत्यु के पहले ही गिर जाते है क्योकिं दांत कठोर होते है और जीभ नरम होती है।यही आप सब के लिए मेरा अंतिम संदेश है कि हमेशा विन्रम बनकर रहो।और कभी भी अपनी वाणी का दुरूपयोग मत करो क्योकिं वाणी ही हमारे व्यक्तित्व का आयना है।
   इन्सान के व्यक्तित्व में सुन्दरता का 10%योगदान होता है जबकि बोलने का तरीका हमारे 90%व्यक्तित्व का निर्माण करता है।हम चाहे तो अपनी बोली से अपना बिगड़ा काम भी सुधार सकते है ,और चाहे तो इसे कैंची की तरह चलाकर सारे रिश्तों को काट सकते है।बोली का सभी के जीवन पर बहुत असर होता है इसीलिए बोलने से पहले सोचना चाहिए क्योकिं बोलने के बाद तो अपनी  कही बात हम धनुष से निकले बाण की तरह वापिस नहीं लौटा सकते।
   एक बार को तलवार से हुआ घाव भर जाता है लेकिन जबान से हुआ घाव नहीं भरता।हमेशा सब से अदब से और् मधुर वाणी में बात करनी चाहिए ,किसी के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुचानी चाहिए और नहीं किसी का मजाक उड़ाना चाहिए।
   तुलसी मीठे वचन से सुख उपजे चहुँ ओर ,वशीकरण यह मन्त्र है तजे वचन कठोर।
           यदि हम सब अपने जीवन में इस बात को मान ले कि शब्द ही पूजा है ,शब्द ही प्रार्थना है और शब्द ही आराधना है तो हम सब सोच समझ कर ही शब्दों का इस्तमाल करेगे और जानबूझकर कर तो क्या अनजाने में भी गलत बात कह कर किसी का दिल नहीं दुखायेगे।हमारे कहे हुए शब्द हमारे जाने के बाद भी गूंजते रहते है अब यह तो हम पर निर्भर है कि हम ऐसे शब्द छोड़कर जाना चाहते है ,जिन्हें सुनकर लोगों को ख़ुशी मिले या फिर जिन्हें याद करके लोगो का दिल दुखे।