व्यवस्था

saint-macarius-of-alexandria

    एक बार एक युवक उतावली में एक संत के पास आया उसने जोर से दरवाजा खोला और जूतों को इधर -उधर फेकते हुए संत से बोला ,प्रभु मुझे आत्मज्ञान दीजिए ।संत ने उसे ध्यान से देखा और पूछा क्या तुम वास्तव में आत्मज्ञानी बनना चाहते हो ?युवक के हाँ कहने पर संत ने कहा कि यदि ज्ञान चाहिए तो पहले उस दरवाजे से माफ़ी मांगो जिसे ठोकर मारकर तुम अंदर आये हो और फिर उन जूतों से जिन्हें तुमने इधर- उधर फेंक दिया हैं।
   युवक सकपकाते हुए बोला प्रभु यह कैसा मजाक हैं क्या दरवाजे और जूतों से भी कोई मांगता है ?आप कहे तो मै आपसे अपनी लापरवाही के लिए माफ़ी मांग लूँ।संत बोले जो व्यक्ति दरवाजे और जूतों को ठीक से नहीं खोल सकता,भला वह व्यक्ति आत्मज्ञान के लिए अपने मन के दरवाजे कैसे खोलेगा ?
    संत ने उसे समझाते हुए कहा जैसे प्रकृति ने हर चीज की एक व्यवस्था बना रखी है कि सूरज और चाँद कब उदय होगें और कब अस्त।इसीप्रकार ऋतुओं के बदलने फूलों के खिलने का ,फलोंव् फसलों  के आने का एक समय निर्धारित हैं। और कौन सा फूल किस पौधे पर लगेगा ,यह सब तय होता हैं।ऐसे ही यदि हम भी अपनी चीजों को निर्धरित जगह पर और सही तरीके से रखते हैं और अपने जीवन में हर काम का एक समय निर्धारित कर लें तो हमारा जीवन व्यवस्थित हो जाता हैं।व्यवस्थित जीवन जीना ही आत्मज्ञान पाने का पहला नियम हैं।
      अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे और दूसरों की गलतियों को माफ़ करें ,इससे भी हमारे जीवन में व्यवस्था आती हैं।हमारा बहुत सारा समय जो कि व्यर्थ की बहस में गुजरता, इस तरह उसे बचाकर हम किसी अच्छे काम में लगा सकते हैं।ईश्वर ने हम सभी को 24 घंटे दिए हैं।अब यह हमारी स्वयं की व्यवस्था पर निर्भर करता हैं कि हम अपने समय का किस तरह उपयोग करते हैं।जिस तरह प्रकृति की व्यवस्था के बल पर ही यह संसार चलता हैं उसी तरह अपने जीवन में व्यवस्था को अपना कर मानव इन्सान से भगवान बनने की क्षमता रखता हैं।हमारे देश में अनेक उदाहरण हैं जैसे भगवान महावीर ,ईसामसीह ,राम कृष्ण ,गुरुनानक देव इन सभी ने मानव के रूप में जन्म लेकर अपने समय को व्यवस्थित कर लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपना वक्त दिया और अपने स्वार्थ के लिए किसी का फायदा नहीं उठाया।हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सुख ,शांति व समृद्धि पाने के लिए व्यवस्था को बनाये रखना चाहिए।