सच्ची भक्ति

Bhagat-Ravidas-Ji1

  एक बार गंगा स्नान के लिए जाते समय संत पुंडरीक ने संत रविदास से भी साथ चलने का आग्रह किया।रविदास ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि मैं अपनी मेहनत की कमाई के दो रूपये दे रहा हूँ ,इन्हें आप गंगा मैया के हाथ में ही देना ,नहीं तो वापिस ले आना।पुंडरीक सोचने लगे भला ऐसा भी हो सकता हैं ?लेकिन संत रविदास का उनकी सच्ची भक्ति के कारण सब बहुत सम्मान करते थे इसलिए उन्होंने चुपचाप जाने में ही भलाई समझी।
         गंगा स्नान के बाद पुंडरीक ने कहा हे गंगा मैया !संत रविदास ने ये दो रूपये आपके हाथों में देने के लिए दिए हैं।उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने गंगा से दो हाथों को बाहर आते देखा।पुंडरीक दोनों हाथो में एक -एक रूपया रखकर चल दिए कि पीछे से आवाज आई कि मेरे भक्त के लिए उपहार तो लेते जाओ।गंगा मैया ने उन्हें हीरे जडित कंगन रविदास को देने के लिए दिया।
   पुंडरीक से कंगन लेकर रविदास ने देखा यह तो बहुत कीमती हैं ,मैं इसे लेकर क्या करूगां इसलिए पुंडरीक को देते हुए बोले इसे तुम ही रख लो।पुंडरीक भी संत थे उन्हें भी वह अपने किसी काम का नहीं लगा सो दोनों ने सोचा कि इसे राजा को दे देते हैं।इतने सुन्दर कंगन को देखकर राजा अभिभूत होते हुए बोला इसे तो मैं रानी को दूँगा ,इसे पाकर वह बहुत खुश हो जाएगी।रानी को कंगन इतना पसंद आया कि उसने दूसरा कंगन लाने के लिए राजा से आग्रह करना शुरू कर दिया।
    राजा के समझाने पर भी जब वह नहीं मानी तो हारकर राजा रविदास के पास जाकर प्रार्थना करने लगे हे प्रभु !ऐसा ही एक कंगन और मंगवा दो नहीं तो मेरी रानी मर जाएगी क्योकि उसने शपथ ली हैं जब उसे ऐसा ही एक और कंगन नहीं मिल जायेगा वह अन्न -जल ग्रहण नहीं करेगी।
  संत रविदास ने अपनी कैटोति में हाथ डाला और कहा हे गंगा -मैया !यदि मैंने तुम्हारी सच्ची भक्ति की हैं तो मेरे हाथ में वैसा ही कंगन आ जाए जैसा आपने मेरे लिए भिजवाया था।उन्होंने हाथ बाहर निकाला तो उनके हाथ में वैसा ही कंगन देखकर राजा बहुत खुश हुआ।और रविदास की जय करता हुआ कंगन लेकर अपने राज्य की ओर चला गया।
      तभी से यह कहावत प्रचलित हो गयी कि मन चंगा तो कैटोती में गंगा।हम सभी अपने -अपने तरीके से ईश्वर की भक्ति करते हैं।लेकिन फिर भी अपनी बात मनवाने की सामर्थ्य नहीं रखते क्योकि हमारी भक्ति में भी हमारा स्वार्थ छिपा रहता हैं,हम हमेशा अपने लिए ही कुछ न कुछ मांगते रहते हैं।एक बार निःस्वार्थ भाव से किसी की मदद करने के लिए ईश्वर से कुछ मांग कर तो देखिए आपको कभी निराश नहीं होना पड़ेगा।
    किसी दूसरे की भलाई के लिए की गई प्रार्थना में ही सच्ची -भक्ति निहित हैं।