परिश्रम

 

  एक प्यासे आदमी ने कुएं के पास जाकर देखा कुएं में पानी है और पास ही एक बालटी  भी रखी है जिसमे रस्सी बंधी हैं जिससे वह पानी निकाल कर अपनी प्यास बुझा सकता हैं। परन्तु उसे तभी ध्यान आया कि उसने तो कभी कोई काम नहीं किया है क्योकि वह अपने आप को नवाबजादा समझता है।वह वही कुएं के पास बैठ गया और इंतजार करने लगा कि कोई आये और उसे पानी पिलाये।
      तभी एक ओर प्यासा आया और उससे बोला पानी पिलाना भाई।उसने जवाब दिया मै तो खुद प्यासा बैठा हूँ कि कोई आये और मुझे पानी दे।दूसरे आदमी ने आश्चर्य से पूछा कि यहाँ तो पानी पीने के सारे साधन मौजूद है फिर भी तुम प्यासे क्यों बैठे हो ?उसने बताया कि वह नवाबजादा है इसलिए काम नहीं करता।अब दूसरे ने सोचा ये नवाबजादा है मै कौन सा शहजादे से कम हूँ मै क्यों कुँए से पानी निकालूँ,सो वह भी उसके पास जाकर बैठ गया।
      सुबह से शाम हो गई दोनों बैठे रहे कि कोई आये और पानी दे।उधर से एक साधु आये उन्होंने बालटी उठाई पानी निकाला और अपनी प्यास बुझाकर बाकि बचा पानी जमीन पर फेक दिया।ये दोनों जो साधु को पानी निकालते देख खुश हो रहे थे कि हमें पानी देने वाला आ गया है,गुस्से से चिल्लाने लगे सारा पानी फेक दिया हमें नहीं पिला सकता था।साधु ने ध्यान से दोनों की ओर देखा उसे वे दोनों हट्टे -कट्टे नजर आये।
      साधु ने उन्हें परिश्रम का महत्व समझाते हुए बताया कि यदि मनुष्य बिना मेहनत के कुछ पाना चाहता है तो उसका हाल तुम दोनों जैसा ही होता है।जैसे कुँए के पास बैठकर भी आज तुम दोनों दिनभर प्यासे ही रहे ऐसे ही यदि हम कर्म नहीं करेगे तो लोगों को दोष देना शुरू कर देगे कि उसने हमारी मदद नहीं की।जबकि मदद तो हम ही अपनी कर सकते है परिश्रम का महत्व समझकर और उसे अपने जीवन में अपना कर।
       दोनों अपनी सोच पर शर्मिंदा हुए और पानी निकाल कर एक दूसरे को पिलाने लगे।इसलिए जीवन में कभी भी काम से मन नहीं चुराना चाहिए ,सभी को जिन्दगी के इस सफ़र में अपने -अपने परिश्रम का योगदान देना चाहिए।

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