Category Archives: ज़िन्दगी

सफलता

 

एक बार सुकरात से किसी आदमी ने पूछा ,सफलता का क्या राज है।सुकरात उसे नदी किनारे ले गए और बोले कि सफलता का राज नदी में है इसलिए अंदर चलो तो तुम्हें खुद ही पता चल जायेगा।आदमी सुकरात के साथ नदी में घुस गया जब गरदन तक पानी आ गया तो आदमी बोला ,अब तो बता दो सफलता कैसे मिल सकती है।सुकरात ने उसकी गरदन पकड़ी और नदी डुबो दी और खुद उसके कंधो पर बैठ गए।उस आदमी ने उन्हें हटाने की की कोशिश की लेकिन वह शक्तिशाली सुकरात को अपने ऊपर से हटाने में ना कामयाब रहा।जब वह आदमी बिल्कुल डूबने वाला था उसे लगने लगा कि वह तो इस पागल सुकरात के हाथों मारा जायेगा तो उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर सुकरात को गिर दिया और चिल्लाने लगा ये क्या तरीका है ?तुम्हें मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं आता तो कह देते मेरी जान क्यों लेना चाहते हो।

सुकरात ने उससे कहा तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इसी बात में है कि जब तुम डूब रहे थे तो तुमने शुरू में कितनी ताकत लगायी।आदमी ने कहा पहले तो मेरी कुछ समझ ही नहीं आया कि यह क्या हुआ ,मुझे लगा तुम मजाक कर रहे हो।इसलिए मैंने थोड़ी सी ताकत लगायी और सोचा तुम खुद ही हट जाओगे लेकिन जब मेरा दम घुटने लगा और तुम टस से मस नहीं हुए तो मैंने सोचा ये पागल तो मुझे मार डालेगा यदि मुझे जिन्दा रहना है अपनी पूरी ताकत लगानी होगी।और तब मैंने पूरी ताकत लगाकर अपनी जान बचा ली।सुकरात ने कहा बस सफलता भी हमारे पूरे प्रयास चाहती है थोड़ी भी कमी रहने पर वह हमें बीच मझधार में ही छोड़ कर किसी ऐसे इन्सान का वरण कर लेती है जो सफलता पाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है।

जोश जगाये होश बढ़ाये आसमान को छू ले हम

नयी सफलताओं के सपने इन आँखों में भर ले हम

अर्जुन की आँखों की तरह हम अपनी आँखे तेज करे ,

लक्ष्य बसा कर इन आँखों में अपने सपने पूर्ण करे

बिना लक्ष्य के जीवन कैसा लक्ष्य बनाना सीखें हम

नयी सफलताओं के सपने इन आँखों में भर ले हम ——

मन को ना मायूस करे हम मन को ना कमजोर करे

कुछ कर गुजरे ऐसा जिससे आने वाला कल निखरे ,

आओ जगाये जज्बा ऐसा इतिहास नया रच डालें हम

नयी सफलताओं के सपने इन आँखों में भर ले हम —–

 

प्रशंसा

 

       एक आश्रम के बाहर बड़ा सा पत्थर पड़ा था।कई लोग उससे टकराए ,किसी की गाड़ी का टायर कट गया तो किसी की साइकिल पलट गयी।सब उस पत्थर को व उस पत्थर को रखने वाले को कोसते और गलियां देते व आगे निकल जाते।एक सब्जी बेचने वाला भी वहां से गुजरा उसके सिर पर सब्जियों से भरा टोकरा था जैसे ही वह पत्थर से टकराया उसकी सारी सब्जियां सड़क पर बिखर गयी।पहले उसने सब्जियां अपने टोकरे में भरी और फिर उस पत्थर को उठाने की कोशिश करने लगा।पत्थर हटाते समय वह केवल यहीं सोच रहा था कि कहीं मेरी तरह किसी और को भी चोट ना लग जाए।आखिर अपने अथक प्रयास से वह उस पत्थर को हटाने में सफल हो गया तो उसने एक कागज देखा जिस पर लिखा था धन्यवाद तुमने बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करने के इरादे से इस भारी पत्थर को हटाया है।इसलिए यह ईनाम स्वीकार करो।उसने जैसे ही कागज को खोला उसमें से एक हजार का नोट मिला।
      हम अपने जीवन में दिखावा तो बहुत करते है लेकिन सही मायने में ऐसा कोई काम नहीं कर पाते जिसके लिए लोग हमें दिल से धन्यवाद कह सके,हमारी प्रशंसा कर सके।हम अच्छे कपडे पहनते है ,अच्छा घर बनाते है ,बड़ी सी गाड़ी रखते है ताकि लोग हमें सराहे।माना कि सजा हुआ घर सजे हुए लोग ,चमचमाती कार सबको बहुत अच्छी लगती है और सब उसकी तारीफ़ भी करते है।लेकिन क्या सही मायने वे हमारी प्रशंसा कर पाते है।जिसके पास ये सारी चीजे है लोग उनसे ईर्ष्या तो कर सकते है उनसे प्यार नहीं करते और प्रशंसा भी मुहं देखी करते है।भले ही हमने यह सब कुछ बहुत मेहनत व ईमानदारी से पाया हो।
      जब तक हम निस्वार्थ भाव से लोगों के काम नहीं आयेगें तब तक हम सच्ची प्रशंसा व लोगों का प्यार पाने काबिल नहीं हो सकते।किसी शहर या प्रान्त पर राज तो अनेक लोगों ने किया है लेकिन पूरी दुनिया के दिलो पर राज करने करने वाले चंद लोग ही है जिन्होंने अपने जीवन में त्याग को अपनाकर दूसरों की भलाई के लिए काम किया और मर कर भी अमर हो गए।लोग उन्हें ही पूजते है जो लोगों के सुख -दुःख में उनके हमदर्द बन उनके साथ होते है।परहित की भावना किसी मिल्कियत की मोहताज नहीं है।इसलिए इसे दिल में आने से मत रोकों।सच्चे हमदर्द बनो और सच्ची प्रशंसा पाओ।

परवरिश

 

        एक जिद्दी ,बिगडैल बच्चा जिससे उसके माता -पिता व संगी -साथी सभी दुखी थे क्योकिं वह हर काम में अपनी बात ही मनवाने की कोशिश करता चाहे उसकी बात सही हो या नहीं।उसके स्कूल से भी अक्सर उसकी शिकायते आती रहती।उसके माता -पिता ने कई बार मनोचिकित्सक से भी उसकी मीटिंग करायी लेकिन कोई खास फर्क नहीं हुआ।उसकी आदतों से दुखी मत पिता ने आखिर उसे गाँव में उसकी नानी घर भेजने का फैसला किया।नानी तो बहुत खुश हो गयी उसकी तो जैसे मुराद पूरी हो गयी वह तो कब से बुला रही थी अपने नाती को।बस उसके माता पिता ही यह सोचकर उसे नहीं भेज रहे थे कि एक तो गाँव में उसकी शिक्षा ठीक से नहीं हो पायेगी और सबसे बड़ा डर की नानी का लाड -प्यार उसे अधिक बिगाड़ देंगा।
    नानी के घर में बच्चे को हर तरह की आजादी के साथ-साथ नाना -नानी का भरपूर प्यार व अटैशन मिला जिससे उसके अंदर मन में पल रहे उपेक्षा के भाव कुछ कम हुए।अब वह सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार करने लगा था ,सबके साथ मिलजुल कर खेलता ,स्कूल में ध्यान से पढ़ता और अध्यापक का कहना मानता।उसके माता पिता जब उससे मिलने आये तो उस दिन उसका रिजल्ट आया था जिसमे उसने 85%मार्क्स के साथ अपनी क्लास में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया था।माता -पिता ने अश्रुमिश्रित ख़ुशी के साथ अपने बेटे को दिल से लगा लिया था।उन्हें समझ आ गया था कि कमी उनके बच्चे में नहीं बल्कि उस परवरिश में थी जो वे उसे दे रहे थे।वे दोनों वर्किंग होने के कारण उसे उतना समय नहीं दे पा रहे थे जितना कि एक बढ़ते हुए बच्चे को पनपने के लिए चाहिए।
     आज एकल परिवार बढ़ गए हैं जिसमें माता -पिता का संतानों पर ज्यादा फोकस हैं अब वे पालक की तरह कम एक मैनेजर की तरह ज्यादा पेश आ रहे हैं।उन्हें मैनर सिखाने के चक्कर में माता -पिता भूल गए हैं बच्चों को थोड़ी आजादी देनी भी जरुरी हैं जिससे कि वे खुद ही कई चीजों को हमारे बिना बताये सीख सके।वैसे भी बच्चे जिस माहौल में रहते उसका ही अनुसरण करते हैं इसलिए बच्चो को ज्यादा आदेश देने के बजाय खुद अच्छा आचरण अपनाना चाहिए ताकि अपने घर में बच्चे कम्फर्टेबिल रहे उन्हें स्कूल से आकर ऐसा ना लगे जैसे एक क्लास से निकले और दूसरी में आ गये।
    हमें अपने बच्चों को अच्छा नागरिक बनाना है तो हमें दिल के रास्ते उनके करीब जाना होगा ,हर समय उपदेश देने से बच्चें चिढ़ने लगते हैं और अपने माता -पिता को परेशान करने में उन्हें आनन्द आने लगता हैं।जब तक बच्चे छोटे होते हैं तो माता -पिता सहन कर लेते हैं लेकिन उनके बड़े होते ही उन्हें अपने बच्चे की ये ही आदतें बुरी लगने लगती हैं और वे उन्हें पीटना शुरू कर देते हैं।मासूम बच्चे समझ ही नहीं पाते कि हमारी जिस आदत को हमारे माता -पिता सबके बीच में बताकर हँसते थे आज अचानक उसी हरकत पर हमारी पिटाई कर देते हैं।धीरे -धीरे बच्चे कुंठित हो जाते है और माता -पिता व बच्चों में एक नदिखने वाली दूरी आ जाती हैं।अंतर्मन में अकेले हुए बच्चे गलत संगति में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं।उनके ऊपर अपने माता पिता के समझाने का कोई असर नहीं होता क्योकिं उनके व्यवहार दुखी हुए बच्चे अपनी ही एक दुनिया बना लेते हैं जिसमे वे वही करते हैं जो उन्हें पसंद हैं।
   यदि हमें आने वाली नयी पीढ़ी को भटकने से रोकना है तो हमें उन्हें ऐसी परवरिश देनी होगी जिसमें बच्चें हमारे प्यार को महसूस करते हुए अपना समुचित विकास कर सके।अपने हर राज व परेशानी को हमारे साथ बाँट सके ताकि हमारे उचित मार्गदर्शन में वे अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ सके।हमें अपने बच्चों को सुख -सुविधाओं के साथ -साथ अपना समय भी देना होगा ताकि बच्चे अपने आपको उपेक्षित महसूस न करें।

अनुगूँज

 

       एक बालक को उसकी माँ ने थप्पड़ मार दिया तो वह इतना नाराज हो गया कि घर छोड़कर चला गया।अपनी धुन में चलते हुए उसे पता भी नहीं चला कि वह एक भयानक जंगल में पहुँच गया हैं ,वह गुस्से में तमतमा रहा था और उसने जोर -जोर से चिल्ला कर बोला आई हेट यू —आई हेट यू।जब वह थोड़ा शांत हुआ तो उसके कानों में आवाज आई ,जैसे कोई उससे कह रहा हो आई हेट यू उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा हैं।वह घबरा गया और अपनी माँ के पास जाकर बोला माँ जंगल के सारे लोग मुझसे नफरत करते हैं। माँ के पूछने पर उसने बताया कि किस तरह वह आई हेट यू कह रहा था कि तभी उसे जंगल के सारे प्राणी ईआइ हेट यू कहने लगे।
    माँ ने अपने बेटे को दुलारते हुए कहा बेटा ये कुदरत एक अनुगूँज हैं हम जो कुछ इसे देते हैं यह कई गुना हमें लौटा देती हैं।तुम चिंता न करो अब जंगल में सभी तुम्हें बहुत प्यार करेगें तुम वहाँ जाकर बोलना आई लव यू।बेटे ने ऐसा ही किया और वापिस आकर अपनी माँ से लिपटते हुए बोला माँ तुम कितनी अच्छी हो तुमने मुझे जंगल के प्राणियों से भी प्यार कैसे पा सकते हैं यह सिखाया हैं।आज जंगल में सभी ने मुझे कई बार प्यार से कहा आई लव यू।
     हम जैसे कर्म करते हैं वैसा ही फल हमें मिलता हैं क्योकिं यही कुदरत का नियम हैं।हम बिना वजह ही अपने भाग्य का रोना रोते रहते हैं कि हमारी किस्मत ही ख़राब हैं हमारे अनेक प्रयास भी हमें सफलता नहीं दिला पा रहे हैं।जबकि सच्चाई तो यह हैं कि हमनें अभी तक उतने प्रयास किये ही नहीं होते जितने कि उस काम की सफलता के लिए चाहिए थे।इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म ही करने चाहिए और बुरे कर्मों से बचना चाहिए।कहते हैं कोई किसी के लिए कुआँ खोदता हैं तो कुदरत उसके लिए पहले से ही एक खाई तैयार कर देती हैं।मरने के बाद भी हमारे कर्म हमारा पीछा करते हैं और हमारा अगला जन्म भी हमारे कर्मो के अनुसार ही निर्धारित होता है और हमारा भाग्य भी हमारे कर्मो से ही लिखा जाता हैं।कुदरत एक अनुगूँज की तरह काम करती हैं यह हमें वही लौटती हैं जो हम इसे देते हैं।इसलिए हमें अपने जीवन परहित का ध्यान रखते हुए अच्छे कर्म करने चाहिए।

 

सुविचार

 

       एक आदमी ने सारी सुख -सुविधाओं से युक्त आलिशान घर बनाया।उसने उसे बनाने में लगभग अपनी सारी पूंजी लगा दी ,वैसे भी वह घर उसके सपनो का महल था जिसे सजाने में वह कोई कसर नहीं रखना चाहता था।वह हर पल अपने घर को बनते हुए देखता और उसमे रहने की कल्पना मात्र से ही अभिभूत हो जाता।कई महीनों तक घर बनता रहा और वह उस पल का इंतजार करता रहा जब गृहप्रवेश होगा।
      आखिर उसका इंतजार ख़त्म हुआ और उसने शुभ मुर्हत में अपने सगे संबंधियों को अपने गृहप्रवेश के लिए निमंत्रण देकर बुला लिया।सभी ने उसके घर की मुक्त कंठ से सराहना की ,और उसने भी सबकी बहुत अच्छी तरह आव-भगत की। सबने मंगल -गीत गांए और उस आदमी को अनेकों बधाइयाँ देते हुए उस अनुपम बेला का इंतजार करने लगे जिसमें गृहप्रवेश होना था।पूरा घर पकवानों की सुगंध से महक रहा था ,चारों और हँसी व ठहाकों की गूंज थी कि तभी घर के तल भाग में रखे एक सिलंडर में आग लग गई।जोर का धमाका हुआ और सभी लोग घर के बाहर आ गए और अपने अपने कयास लगाने लगे कि यह आवाज कैसी हैं।
     देखते -देखते उस आदमी के सपनों का महल धूं -धूं कर जलने लगा किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था ,दमकलें आग बुझाने के लिए आ चुकी थी लेकिन आग काबू में नहीं आ रही थी और थोड़ी देर में ही वह सुन्दर घर राख के ढेर में बदल चुका था।सभी लोग अपने -अपने तरीके से सहानुभूति दिखाते हुए कह रहे थे बहुत बुरा हुआ ,कोई कह रहा था कि सारा पैसा व मेहनत बेकार हो गया आपका तो।उधर शांत भाव से वह आदमी ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रहा था और कह रहा था ,हे ईश्वर !तेरी असीम कृपा हैं जो तूने मेरे परिवार व सगे संबंधियों को बचा लिया।इस घर को तो जलना ही था क्योकिं शायद यही इसकी नियति में तूने लिखा था लेकिन तू कितना दयालु हैं कि तूने हम सब को बचा लिया।
   उसके विचार सुनकर सभी लोग उस व्यक्ति के प्रति नत –  मस्तक हो गए और उसे प्यार से  गले लगाते हुए बोले जो आदमी ऐसे कठिन समय में भी  इतने सुन्दर विचार रखता हैं उसे घरो की क्या कमी ,तुम्हारें जैसे इंसानों पर तो ईश्वर अपनी विशेष कृपा करते है तुम्हें जल्दी इससे भी अच्छा घर मिलेगा।हमारे विचार ही हमारे चरित्र का आयना हैं हम जैसी सोच रखते हैं वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनता हैं।अपनी अच्छी सोच की वजह से एक इन्सान महान बन सबका प्रिय बन जाता हैं और दूसरा जो कि बुरे विचार रखता हैं सबकी घृणा झेलता हैं और जीवन भर दुखी रहता हैं।
   बुरे विचार हमारी प्रगति में बाधक होने के साथ हमारे सुकून ,हमारे मन की शांति भी भंग कर देते हैं।बुरे विचारों वाला व्यक्ति हमेशा अकेलेपन में जीता हैं क्योकि उसे कोई प्यार नहीं करता सब उसकी उपेक्षा करते हैं।इसलिए हमें अपने विचारो को हमेशा अच्छा रखना चाहिए।हमारे सदविचार हर समय हमें प्रगति की और अग्रसर करते हैं और हमारे चारों ओर हमें प्यार करने वालों को मौजूद रखते हैं जिसकी वजह से हम हमेशा अपने आपको खुश और प्रसन्न पाते हैं।सुविचार प्रसन्नता के खजाने की चाबी हैं इस लिए हमें हमेशा अपने अन्दर सभांल कर रखना चाहिए।

निर्णय

 

     दो सगे भाई एक शराबी और दूसरा सदाचारी और दूसरों की मदद करने वाला था। शराबी हमेशा नशे में अपनी पत्नी व बच्चों को मारता -पीटता था।इस वजह से वे सब उससे बहुत डरते थे।एक बार एक बुजुर्ग ने उसे समझाते हुए कहा देखो तुम्हारे इस व्यवहार से तुम्हारा परिवार कितना परेशान रहता हैं ,तुम इस आदत को छोड़ दो।उसने कहा शराब पीना ,पत्नी व बच्चों को पीटना यह सब तो मेरे खून में हैं क्योकिं मेरे पिता यह करते थे इसलिए मैं भी शराब पीता हूँ और उन्हें दुःख देना मुझे अच्छा लगता हैं क्योकिं मैंने भी अपने बचपन में बिना गलती के बहुत मार खायी हैं।
   बुजुर्ग ने सोचा इसे समझाना मुश्किल हैं क्यों न इसके भाई से ही इसे सुधारने की युक्ति जानी जाए क्योकिं वह भी तो इसी माहौल में पला हैं और फिर भी सदाचारी हैं।उन्होनें उसके छोटे भाई से पूछा तुम इतना अच्छा आचरण कैसे कर लेते हो जबकि तुम एक शराबी पिता की संतान हो।उसने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि जब मैं अपनी माँ व भाई बहनों और खुद को बिना गलती के पिटते देखता तो मुझे बहुत दुःख होता था और मैंने तभी एक निर्णय ले लिया था कि मैं कभी शराब नहीं पिऊंगा और नहीं कभी अपनी पत्नी व बच्चों पर हाथ उठाऊंगा।हमेशा सबको खुश रखूँगा।बुजुर्ग जान गए थे कि हमारे निर्णय ही हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं न कि परिस्तिथियाँ।
    इन्सान को भगवान ने सोचने समझने की शक्ति प्रदान की हैं अब यह इन्सान पर निर्भर हैं कि वह अपना जीवन कैसा बनाये।इन्सान के अपने फैसले ही उसे सुखद या दुखद जीवन देते हैं लेकिन वह हमेशा अपने आस-पास के माहौल को ही जिम्मेदार ठहराता रहता हैं,जबकि वह अपने जीने के कोई मापदंड तय नहीं करता और परिस्तिथि वश जो कुछ होता हैं उसी में दुखी व ख़ुशी तलाशता रह जाता हैं। यदि हम सोच ले हमें हर हाल में खुश रहना हैं तो दुनिया की कोई भी मुश्किल हमें दुखी नहीं कर सकती।बल्कि हमारा खुश रहने का निर्णय हमारी हर मुश्किल को आसान कर देता हैं।आइये हमेशा खुश रहने के निर्णय के साथ उस ईश्वर के को याद करें जिसने हमें निर्णय लेने के काबिल बनाया —–
   नाम प्रभु का मंगलकारी सब दुःख हरने वाला ,
 घोर भयंकर जंगल में भी मंगल करने वाला ,
आना सदा अकेले ही हैं जाना सदा अकेले ,
नाम प्रभु का ले ले नाम प्रभु का ले ले
कितने -कितने जन्म गवांये कितने संकट झेले,
नाम प्रभु का ले ले ,नाम प्रभु का ले ले।

मुस्कुराहट

 

   एक बच्ची अपने पिता से बहुत प्यार करती थी उसके पिता ने ही उसे पाला था क्योकिं बचपन में ही उसकी माँ मर गयी थी।थोड़ी बड़ी होते ही बिटिया अपने पिता के लिए नाश्ता ,खाना बनाने के साथ उनकी हर छोटी -बड़ी जरूरतों का ध्यान रखने लगी।पिता अपनी प्यारी सी बिटिया को बहुत प्रेम करते थे और उसको हमेशा अपने आस -पास ही रखते थे।एक दिन अचानक बिटिया बीमार हुई और चल बसी।पिता की तो जैसे दुनिया ही लुट गयी ,वह हर समय बिटिया को याद करके रोते रहते उन्हें न खाने -पीने की सुध रही और नहीं अपने काम की।
   एक दिन इसी तरह रोते -रोते जब वह सो गए तो उन्होंने देखा बहुत सारी परियाँ हाथ में मोमबत्ती लिए अपनी मस्ती में इघर -उधर घूम रही हैं ,उन्हीं में एक परी जिसके हाथ में बुझी मोमबत्ती है और वह उदास भी हैं।पिता ने उसके पास जाकर देखा कि यह तो उसकी प्यारी बिटिया है ,उसने उसकी उदासी व बुझी हुई मोमबत्ती के बारे में पूछा तो परी बन गयी बेटी ने बताया कि आप मेरी याद में रोते रहते हैं इसलिए आपके आंसुओ से मेरी मोमबत्ती बुझ जाती है और आपको उदास देखकर मैं भी उदास रहने लगी हूँ।पिता को अपनी गलती का अहसास हुआ तो अपनी बिटिया को गले लगाकर पिता हँसने लगे तो बिटिया भी हँस पड़ी और परी के हाथ की मोमबत्ती स्वयं ही जल गई।
    पिता की नींद खुल गई अब उन्होंने कभी दुखी न होने का प्रण ले लिया।बहुत से गरीब व अनाथ बच्चों की सेवा करने लगे अब उन्हें पापा कहकर बुलाने वाले अनेकों बच्चे हो गए हैं और वह हमेशा खुश रहते है अपनी इस नई दुनिया में।मुस्कुराहट हमें जीने की प्रेरणा देती हैं जबकि आंसू हमारी जीवन शक्ति को नष्ट करके हमें गम के गहरे गर्त में ले जाते हैं जिसमें डूबकर हम अपनी काबिलियत को भुलाकर कुछ भी सोचने -समझने लायक नहीं नहीं बचते हैं।इसलिए कैसी भी परिस्तिथि हो हमें खुश रहना चाहिए क्योकिं जहाँ कोई तरकीब नहीं चलती वहाँ छोटी सी मुस्कुराहट काम बना देती है।इसलिए तो कहते हैं —
   जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो ,फासले कम करो दिल मिलाते रहो।
  दर्द कैसा भी हो आँख नम ना करो ,रात काली सही कोई गम ना करो ,
 एक सितारा बनो जगमगाते रहो ,फ़ासले कम करो दिल मिलते रहो।
 बाँटना है अगर बाँट लो हर ख़ुशी गम न जाहिर करो तुम किसी को कभी ,
दिल की गहराई में गम छिपाते रहो ,फासले कम करो दिल मिलाते रहो।
जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो —————————————————.

जीने का ढंग

 

     एक बार कुछ दोस्त समुंद्र किनारे घूमने गए।वहां उन्होंने देर रात तक शराब पी और जब सभी नशे में मदहोश हो गए तो बोले अभी घर जाकर क्या करेगें क्यों न समुंद्र की सैर का मजा ले।सब नाव में सवार हो गए सारी रात बारी -बारी से पतवार चलाते रहे।सुबह उन्हें लगा कि अब तो हमारा नशा लगभग उतर चुका है और हम नाव चलाकर थक भी गए हैं क्यों न घर चले।दो दोस्त नीचे उतरे और जोर -जोर से हँसने लगे ,बाकि के दोस्तों ने पूछा कि क्यों हँस रहे हो तब उन्होंने बताया कि हमने नाव का लंगर तो खोला ही नहीं।बस हम सब भी इन शराबी दोस्तों की तरह अपनी जिन्दगी का लंगर खोले बैगर बस जीये जा रहे हैं।
     हममें से ज्यादातर लोग बिना किसी उद्देश्य के अपना जीवन जीते हैं और एक दिन अपने जीवन के वे अनमोल साल जिनमे हम बहुत कुछ कर सकते थे, बस यूहीं खाने सोने में बिताकर इस दुनिया से रुखसत हो जाते हैं।न हम अपने लिए खाने -पीने के नियम बनाते हैं नहीं सोने और दूसरे कामों के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करते हैं।जब जो खाने का मन किया खा लिया ,जब सोने का मन हुआ सो गए और जब कुछ करने का मन हुआ कर लिया नहीं तो कल पर टाल दिया।इस जीवन शैली ने सबसे ज्यादा नुकसान हमारी आने वाली पीढियों का हो रहा हैं ,एक मासूम को रात के 11 ,12 बजे तक सोने का माहौल नहीं दिया जाता और फिर उसे सुबह 5 ,6बजे उठाकर खड़ा कर दिया जाता हैं कि जल्दी उठो नहीं तो स्कूल बस निकल जाएगी।अक्सर माता पिता यह शिकायत करते मिल जायेगें कि हम क्या करे हमारा बच्चा रात में जल्दी नहीं सोता हैं।वे अपने आपसे पूछे क्या क्या वे अपने बच्चे को सही समय पर नाश्ता खाना दे रहे हैं और यदि दे रहे हैं तो क्या पौष्टिकता व शुद्धता का ध्यान रख रहे हैं ?
सच तो यही हैं कि हम न अपने बच्चों को वह खाना दे रहे जो उनके सही विकास में सहायक हो और न वह माहौल दे रहे हैं जिसमे पल कर बच्चा ऐसे संस्कार पा सके कि बड़ा होकर वह सही और गलत में फर्क कर सके।
आज हमारे पास सब सुख साधन होते हुए भी जीवन में सुकून नहीं हैं ,रिश्तों में अपनापन नहीं हैं।आज का इन्सान ज्यादा होशियार व कर्मशील हो गया हैं ,अब लोग सिर्फ दिन में ही नहीं अपितु रात में भी काम करते हैं ,और पति -पत्नी दोनों कमाने लगे हैं।पैसा खूब हैं लेकिन अपनेपन के लिए तरस रहे हैं कोई नहीं समझ रहा हैं कि कितना जरुरी हैं कि अपनों के साथ बैठ कर प्यार के दो बोल बोले और उन्हें बताये कि हम उन्हें बहुत प्यार करते हैं।कमियां सबमें होती है परन्तु यदि हम अपने रिश्तों को अच्छा बनाना चाहते हैं तो हमें अपनों कि कमियों को नजरंदाज करके उनके गुणों सराहना होगा तभी हम एक सुखी परिवार बना सकेगे।हमें अपने जीवन खाने -पीने ,सोने व काम करने के भी कुछ नियम बनाने चाहिए ताकि हम अपने बच्चों को एक अनुशासित जीवन दे सके।उनके जीने के ढंग से लोग प्रेरणा ले नकि उन्हें बात -बात पर धिक्कारे।यदि हर परिवार प्यार के साथ -साथ जीने के ढंग को ठीक कर ले तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में चारों और खुशहाली और प्रगति होगी।

तृप्ति

 

  राजा ययाति की अनेको रानियाँ थी और उन्होंने अपने राज्य के चलते बहुत सुख भोगा, जब वे सौ साल के थे तो मृत्यु को सामने पाकर गिडगिडाने लगे कि उन्हें कुछ दिन ओर जीवित रहने दे ताकि वे ओर सुख भोग सके।मृत्यु ने कहा वह कभी खाली नहीं लौट सकती ,यदि तुम्हारी जगह कोई ओर जाने को तैयार हो तो मैं तुम्हें सौ वर्ष और दे दूंगा।राजा ने अपने बड़े बेटे से मृत्यु के साथ जाने को कहा और उसका बेटा ख़ुशी -ख़ुशी पिता के लिए कुर्बान हो गया।इस तरह ययाति एक हजार वर्ष के हो गए वे एक बाद एक करके अपने सारे बेटों को मृत्यु के साथ विदा करते रहे।
   मृत्यु ने सोचा अब तो ययाति अवश्य ही इस जीवन के सुखों को भोग कर तृप्त हो गए होगें सो उसने उन्हें अपने साथ चलने को कहा लेकिन उन्होंने अपने अंतिम बेटे को मृत्यु को सौंपते हुए कुछ दिन और जीने की इच्छा प्रकट की।मृत्यु ने  17वर्षीय बेटे को एक ओर ले जाकर कहा तुम क्यों मेरे साथ जाना चाहते हो अभी तुमने देखा ही क्या है ?बेटे ने मृत्यु से पूछा कि उसकी उम्र कितनी है ?मृत्यु ने बताया कि सौ साल।बेटे ने कहा कि यदि मेरे पिता एक हजार साल जीकर भी तृप्त नहीं हुए तो मैं सौ साल में कैसे तृप्त होऊंगा।अब यदि अतृप्त ही जाना हैं तो फिर अभी क्यों नहीं ?
   हम सब इस ओर पाने की लालसा में ही कब अपना जीवन पूरा कर लेते हैं ,हमें पता ही नहीं चलता।हमारी एक इच्छा पूरी होने से पहले ही दूसरी इच्छा जागृत हो जाती हैं और हम एक अंतहीन तृष्णा के गुलाम हो जाते हैं।हमें अंतर्मन में देखते हुए यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि हमारा जन्म किस उद्देश्य  के लिए हुआ हैं।हमें यह जीवन कुछ निश्चित वर्ष ही जीने के लिए ही मिला हैं , अब यह हम पर निर्भर करता हैं हम अपने जीवन को कैसे जीते हैं ?हम चाहे तो छोटी उम्र पाकर भी कुछ ऐसे अच्छे काम करके जा सकते हैं कि हमारे जाने के बाद भी हम अपने सद्कर्मो के कारण लोगों के दिलों प्यार बनकर जिन्दा रहें।
    यदि हम अपने जीवन में तृप्ति को स्थान दे तो कुछ अच्छे कर्म अवश्य कर जायेगें क्योकिं अतृप्त लोग तो हमेशा अपने स्वार्थ साधने में ही लगे रहते हैं,उन्हें हमेशा ऐसा लगता हैं कि दुनिया में सबके पास बहुत कुछ हैं बस एक वही हैं जिन्हें कुछ नहीं मिला।तृप्ति एक ऐसी साधना हैं जिसे अपनाने के बाद कुछ पाना बाकि नहीं रहता।

अंकुश

 

      एक संभ्रांत परिवार में रात के समय पुलिस ने दरवाजा खटखटाया तो मालिक ने दरवाजा खोलते ही पूछा कि मेरे घर क्यों आये हो ?पुलिसवाले ने बताया कि आपके बेटे को गिरफ्तार करने आये है।यह सुनकर हैरान पिता ने फिर पूछा कि मेरे बेटे ने ऐसा क्या कर दिया कि आप उसे पकड़ने आ गए।पुलिसवाले ने कुछ फोटो दिखाते हुए कहा कि आज शाम को आपके बेटे और उसके साथियों ने मिलकर इन बच्चियों के साथ पार्क में जाकर बदतमीजी की है।इसके दोस्तों को तो हम पकड चुके है ,अब इसकी बारी है।
      हैरान -परेशान पिता ने अपने बेटे के कमरे में जाकर पूछा क्या तुम आज पार्क गए थे ?बेटे ने कहा हाँ गया था।पिता ने पूछा क्या तुमने वहां बच्चियों से छेड़खानी की ?बेटा घबराया कि उसके पिता को कैसे मालूम हुआ ,उसने शर्म से सिर झुका लिया और कुछ नहीं बोला।पिता ने बेटे को पुलिसवाले को सौंपते हुए दस हजार रूपये दिए।पुलिसवाले ने सोचा कि पिता अपने बेटे को बचाने के लिए हमें रिश्वत दे रहा है।पुलिसवाले के कुछ बोलने से पहले ही पिता बोल पड़े कि ये पैसे मैं इसलिए दे रहा हूँ कि मेरे बेटे की इतनी पिटाई करना कि फिर कभी मेरे घर पुलिस न आये।
     काश इस पिता की तरह ही हर माँ -बाप हो जो अपने बच्चों को उनकी गलती का दंड भी भुगतने दे ,ताकि आगे जीवन में वे गलतियाँ करने से पहले सोचे कि इसकी सजा भी हमें ही मिलनी है।जबकि अक्सर माता -पिता अपने बच्चे के मोह के वशीभूत होकर इतने कमजोर हो जाते हैं कि उसी नालायक बच्चे के सामने गिडगिडाने लगते है और उससे दया की भीख मांगने लगते हैं कि तू जो चाहेगा करेगें बस हमें समाज में बेइज्जत मत कर।एक दिन ऐसा भी आता हैं जब यह बच्चा अपना नुकसान तो करता ही हैं अपने परिवार को भी किसी लायक नहीं छोड़ता क्योकिं उसे लगने लगता हैं कि उस पर अंकुश रखनेवाले उसके माँ -बाप तो उसके प्यार में अंधे होकर विवश हो चुके हैं। इसलिए वह मनमानी करते हुए अपना जीवन बर्बाद कर लेता हैं।
     हमें यदि अपने बच्चों को एक खुशहाल जीवन देना हैं तो उन्हें सुख -सुविधाओं के साथ अंकुश भरा व्यवहार भी करना होगा ताकि बच्चे इतने गुस्ताख न हो जाए कि गलत सही में भेद ही न कर सके और कुछ काम तो सिर्फ इसलिए करे कि उन्हें इसे करने में मजा आता है।बच्चें माँ -बाप की जान होते है और ईश्वर का दिया वह अनुपम उपहार होते है जिनके आने से हमारे जीवन में ख़ुशी आ जाती हैं और हम अपने आपको एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हुआ पाते है।इसलिए ईश्वर की इस सुन्दर कृति को हमें प्यार के साथ सभांलते हुए इन पर अंकुश भी रखना चाहिए ताकि बच्चे नादानी में अपना अहित ना कर सके।

इच्छा

 

     एक राजा सारी  सुख -सुविधाओं के बावजूद दुखी रहता था।एक दिन दुखी मन लिए वह टहल रहा था कि उसकी नजर अपने एक नौकर पर पड़ी जो काम करते -करते गाना रहा था और बहुत खुश नजर आ रहा था।राजा ने अपने मंत्री से पूछा यह नौकर काम के दबाव के बाद भी इतना खुश कैसे हो सकता है कि गाना गा रहा है और मस्त दिखाई पड़ता है।मंत्री ने कहा महाराज यह इतना खुश इसलिए है कि यह अभी तक 99 क्लब का सदस्य नहीं बन पाया है।राजा ने पूछा यह 99 क्लब क्या है ?मंत्री ने जवाब दिया महाराज मैं इसे इस क्लब का सदस्य बनाने का प्रयास करता हूँ फिर आप इसी से पूछ लेना कि यह कौन सा क्लब है जिसका सदस्य बनने पर लोग अपना सुकून खो देते है।
   अगले दिन मंत्री ने उस गरीब नौकर के घर के बाहर एक अशर्फियों से भरी थैली रखवा दी।जैसे ही नौकर की नजर उस पर पड़ी वह उसे लेकर अन्दर गया और खोलकर देखा तो उसमें भरी अशर्फिया देखकर खुश होता हुआ बोला आज तो ईश्वर ने मुझ गरीब पर बड़ी कृपा कर दी जो मुझे घर बैठे ही इतना धन मिल गया।हमेशा अपने काम में मस्त रहने वाले नौकर के दिल में धन मिलते ही अनेकों इच्छाएं मचलने लगी उसने एक पल में ही न जाने कितना कुछ सोच लिया कि वह उस धन से क्या -क्या करेगा ?
   अपनी इच्छाओं की पूर्ति के के लिए उसे 100 अशर्फिया काफ़ी लगी।वह उन्हें गिनने लगा कि कितनी है तो वे 99 ही थी।उसने सोचा जहाँ इतने दिनों तक मैंने अपनी इच्छाएं दबा कर रखी कुछ दिन और सही ,मैं एक ओर अशर्फी कमाकर ही अपनी इच्छा पूरी करूँगा।उसने जी तोड़ मेहनत शुरू कर दी अब वह पहले समान न तो गाना गा  पाता और नहीं खुश दिखाई पड़ता  वह किसी तरह मेहनत करके एक अशर्फी लाता और घर की किसी न किसी जरूरत  के लिए उसको खर्च करना पड़ता।अपने परिवार के साथ सुख से रहने वाला इन्सान अब बात -बात पर घर वालों से झगड़ने लगा कि वे उसकी मेहनत के पैसो को उड़ा रहे है।
      एक दिन उसे उदास देखकर राजा ने उससे उसके दुखी होने का कारण पूछा तो उसने रोते हुए कहा महाराज क्या बताऊ मैं अपने परिवार के साथ रुखा -सुखा खाकर भी बहुत खुश था लेकिन जब से मुझे 99 अशर्फियाँ मिली हैं मैंने अपना सुख चैन खो दिया है मैं बस उन्हें 100 करने के जुगाड़ में लग गया हूँ। राजा को अपने दुखी रहने का राज समझ आ गया था।उन्होंने उस दिन से ही अपनी इच्छाओं को सीमित करने का विचार किया और नौकर को भी समझाया कि उसे अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर अपना चैन नहीं खोना चाहिए क्योकिं इच्छाओं का कोई अंत नहीं हैं।एक इच्छा पूरी होने से पहले ही दूसरी जन्म ले लेती है।
      इससे पहले की इच्छाएं हमें अपने वश में कर ले हमें अपनी इच्छाओं को अपने वश में कर लेना चाहिए ताकि वे हम पर हावी होकर वे हमसे हमारा सुकून ,हमारे अपने न छीन ले। वैसे देखा जाए तो बिना इच्छा के इन्सान तरक्की की राह पर नहीं बढ़ सकता लेकिन फिर भी इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसकी असली ख़ुशी अपने परिवार के साथ होने में है न की बहुत सारा धन कमाकर उसे जोड़ने में।इन्सान कितना भी धन जोड़ ले सब यही छूट जाता है साथ जाते है तो वे प्यारे कर्म जब हमारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।इन्सान को अगर इच्छा रखनी है तो वह ऐसी होनी चाहिए कि दूसरे का भी भला हो सके।ताकि यहाँ जाने के बाद भी हम लोगों के दिलों में प्यार का एहसास बन मुस्कराते रहे।

आत्मसंतोष

 

    एक आदमी के यहाँ एक मेमना और गाय व उसका बछड़ा रहता था।एक बार बछड़े ने दुखी होते हुए अपनी माँ से कहा कि हमारे साथ पक्षपात हो रहा है।हमारा मालिक मेमने को माल खिलाता है और आपको सूखी घास देता है ,आप उसे फिर भी दूध देती है और यह दिनभर इधर -उधर कूदता रहता हैउसके किसी काम नहीं आता , तो भी मालिक इसका बहुत ध्यान रखता है।
    गाय ने अपने बच्चे को समझाते हुए कहा ,बेटा हमें जो कुछ भी मिलता है उसमे संतोष करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।और अपने ऊपर किये गए उपकार का बदला जी जान से लौटना चाहिए मालिक हमें घास देता है यह उसका एहसान है हम पर यदि वह चाहे तो हमें घास भी न दे तो भी हम उसका क्या कर लेगे ?तुम दुखी मत होओं मैंने ऐसे कई मेमने आते जाते देखे है इन दस सालो में।बछड़ा माँ की बात से संतुष्ट नहीं हो पाया और दुखी रहने लगा।
    एक दिन घर में आये बहुत से मेहमानों को देखकर बछड़ा बहुत खुश था कि आज तो बहुत माल बनेगे हो सकता है मालिक हमें भी खाने को दे ,तभी उसकी नजर मेमने पर पड़ी उसकी गरदन मालिक के हाथ में थी और उसके बेटे ने एक झटके में उसे काट डाला।बछड़ा बुरी तरह सहम गया और अपनी माँ के पास जाकर उससे लिपटकर रोते हुए बोला कि माँ आप ठीक कह रही थी कि हमें जो मिलता है उसी में खुश रहकर अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला उतारने के लिए अपनी तरफ से बेहतर देने की कोशिश करनी चाहिए।किसी से  मुफ्त की सेवाएं नहीं लेनी चाहिए।
  गाय बहुत खुश थी कि उसके बच्चे ने जीवन का बहुत बड़ा सबक सीख लिया था और अब वह अपनी स्तिथि में खुश रहना सीख गया था।आज हम सब और अधिक पाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है और बहुत सारे सुख साधन जुटाकर भी खुश नहीं है क्योकि हमारा असली सुख हमारा आत्मसंतोष हमारे पास नहीं रहा है।पहले एक कमाता था और दस खाते थे अब दस के दस कमाते है और एक भी चैन से बैठ कर नहीं खा रहा है क्योकिं हमारे पास किसी के लिए समय ही नहीं है।हमें कोशिश करके अपने जीवन में संतोष को स्थान देना चाहिए ताकि मेहनत करके हमने जो कुछ पाया है उसका सुख भी देख सके।कई लोग संतोष को अपनी प्रगति में बाधक मानते है जबकि ऐसा नहीं है यदि हम संतोष के साथ अपने अपने कर्म करते रहे तो हम लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर होते रहते है और अपने जीवन में उन सुखद पलों को भी जी पाते है जो सही मायने में हमारी जीवन शक्ति बनकर हमारे साथ रहते है।संतोष कभी भी किसी को कर्महीन होने के लिए नहीं कहता बल्कि वह तो हमेशा इंसान के अच्छे कर्मो में ही छिपा है।इसलिए हमें हमेशा सद्कर्म करते हुए संतोष के साथ जीवन यापन करना चाहिए।

 

बोलने की कला

 

    एक संत जो कि 90 वर्ष के हो चुके थे ,उन्होंने घोषणा की कि वे कल वे जीवित समाधि ले लेगें।शिष्यों ने उनसे कुछ समय ओर  रुकने का अनुरोध किया।गुरु के न मानने पर उन्होंने उनसे जीवन के लिए कोई बहुमूल्य उपदेश देने को कहा।संत ने उनका आग्रह स्वीकारते हुए समाधि के समय ही उपदेश देने को कह।अगले दिन सारे शिष्यों को समाधि स्थल पर एकत्रित देख गुरु जी ने मुंह खोलकर शिष्यों से पूछा कि उन्हें उनके मुंह में क्या दिखाई दे रहा है ?सभी शिष्य एक स्वर में बोले जीभ।
    गुरूजी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जीभ जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ रहती है ,जबकि दांत जन्म के बाद आते है और अक्सर मृत्यु के पहले ही गिर जाते है क्योकिं दांत कठोर होते है और जीभ नरम होती है।यही आप सब के लिए मेरा अंतिम संदेश है कि हमेशा विन्रम बनकर रहो।और कभी भी अपनी वाणी का दुरूपयोग मत करो क्योकिं वाणी ही हमारे व्यक्तित्व का आयना है।
   इन्सान के व्यक्तित्व में सुन्दरता का 10%योगदान होता है जबकि बोलने का तरीका हमारे 90%व्यक्तित्व का निर्माण करता है।हम चाहे तो अपनी बोली से अपना बिगड़ा काम भी सुधार सकते है ,और चाहे तो इसे कैंची की तरह चलाकर सारे रिश्तों को काट सकते है।बोली का सभी के जीवन पर बहुत असर होता है इसीलिए बोलने से पहले सोचना चाहिए क्योकिं बोलने के बाद तो अपनी  कही बात हम धनुष से निकले बाण की तरह वापिस नहीं लौटा सकते।
   एक बार को तलवार से हुआ घाव भर जाता है लेकिन जबान से हुआ घाव नहीं भरता।हमेशा सब से अदब से और् मधुर वाणी में बात करनी चाहिए ,किसी के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुचानी चाहिए और नहीं किसी का मजाक उड़ाना चाहिए।
   तुलसी मीठे वचन से सुख उपजे चहुँ ओर ,वशीकरण यह मन्त्र है तजे वचन कठोर।
           यदि हम सब अपने जीवन में इस बात को मान ले कि शब्द ही पूजा है ,शब्द ही प्रार्थना है और शब्द ही आराधना है तो हम सब सोच समझ कर ही शब्दों का इस्तमाल करेगे और जानबूझकर कर तो क्या अनजाने में भी गलत बात कह कर किसी का दिल नहीं दुखायेगे।हमारे कहे हुए शब्द हमारे जाने के बाद भी गूंजते रहते है अब यह तो हम पर निर्भर है कि हम ऐसे शब्द छोड़कर जाना चाहते है ,जिन्हें सुनकर लोगों को ख़ुशी मिले या फिर जिन्हें याद करके लोगो का दिल दुखे।

भरोसा

 

पन्द्रह जवानों का समूह अपने अधिकारी के नेतृत्व में हिमालय की और बढ रहा था।ठंड का मौसम था,रात हो चली थी और जवान भी थक गए थे।तभी उनकी नजर एक बंद पड़ी चाय की दुकान पर पड़ी उन्होंने अपने मेजर से पूछा क्या वे दुकान का ताला तोड़कर चाय बनाकर पी सकते है।मेजर ने वक्त की नजाकत को समझते हुए इजाजत दे दी।जवानो ने चाय पी और पूरे उत्साह से अपने मिशन की ओर चल दिए।

तीन महीने बाद जब वे लौटकर आये तो वह दुकान खुली देखकर वे उसमें गए चायवाला एक गरीब बूढ़ा आदमी था।इतने लोगों को एक साथ देखकर बहुत खुश हुआ कि आज तो अच्छी कमाई होगी। जवानों ने जमकर नाश्ता किया और उससे बाते करते हुए पूछा कि दूरदराज के इलाके में दुकान चलाने का क्या मकसद है।उस बूढ़े आदमी ने जो भी जवाब दिया सब में ईश्वर के प्रति अगाध भरोसा था कि उसने सब कुछ ईश्वर की इच्छा से किया है ,वरना उसकी हस्ती ही क्या है ?जवानो ने उसकी बात से असहमत होते हुए कहा कि यह सब तुम्हारी मेहनत और हिम्मत की वजह से है ,यदि भगवान कुछ करने वाला होता तो तुम इतने गरीब नहीं होते।

बूढ़े आदमी ने उन्हें बताया कि जब -जब मैंने ईश्वर से मदद मांगी है उसने मेरी मदद की है।उसने तीन महीने पहले का अनुभव बताते हुए कहा कि मेरे बेटे की बहुत तबियत ख़राब थी मै जल्दी दुकान बंद करके चला गया था।मेरे पास बच्चे की दवाई के भी पैसे नहीं थे ,मैंने ईश्वर से प्रार्थना की और सुबह जब दुकान पर पहुंचा तो दुकान का ताला टूटा हुआ था और चीनी के डिब्बे के पास एक हजार का नोट रखा था।मेरे ईश्वर ने मेरी मदद करने के लिए मेरी दुकान का ताला खोला और मुझे इतना धन दे गये कि मेरे बच्चे का इलाज आराम से हो गया।

बूढ़े की बात सुनकर जवान बताना चाहते थे कि यह नोट तो उनके मेजर ने वहाँ रखा था लेकिन मेजर ने इशारे से मना किया क्योकि वह नहीं चाहता था कि बूढ़े आदमी का ईश्वर से भरोसा उठ जाए।वैसे भी ईश्वर कभी भी खुद प्रकट होकर किसी की मदद नहीं करते वे किसी न किसी को अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजते है।इसीलिए तो जब मुसीबत में कोई हमारे काम आता है तो हम उसे अनेको धन्यवाद के साथ यह कहना नहीं भूलते कि आप तो हमारे जीवन में भगवान बनकर आये है।

भरोसा हमारे जीने का आधार है बिना भरोसे के कोई रिश्ता नहीं बन सकता।बिना भरोसे के हम अपने जीवन में सफल नहीं हो सकते। इसीलिए हमें अपने जीवन से संदेह को निकालकर भरोसे को जगह देनी चाहिए ताकि हम एक सुखद व शांतिपूर्ण जीवन जी सके।

 

सहयोग

 

एक व्यक्ति अपनी पत्नी का बिल्कुल भी सहयोग नहीं करता था उसने यह मानसिकता बना रखी थी कि कुछ भी हो जाए घर के काम तो पत्नी ही करेगीं। उसकी आदतों से परेशान पत्नी को एक उपाय सूझा वह सिरदर्द का बहाना करके लेट गयी।पति को ऑफिस जाना था और खाना बनाना आता नहीं था ऊपर से भूख भी बहुत लगी थी सो पत्नी की खुशामद करने लगा कि किसी तरह उठकर कुछ बना दो ताकि मैं समय पर ऑफिस जा सकूँ।पत्नी जिसने अपने पति को सुधारने का दृढ निश्चय कर लिया था ,प्यार से बोली प्रिय आज तुम बाहर से लेकर कुछ खा लेना आज तो बिल्कुल नहीं उठ सकती।

अब तो यह लगभग रोज का सिलसिला हो गया कि पति से घर भूखा जाता और बाहर जाकर खाता।पीछे से पत्नी उठती अपने लायक खाना बनाती खाती और पति के आने से पहले ही लेट जाती।रोज -रोज बाहर का खाना खाकर पति की सेहत भी ख़राब होने लगी और वह परेशान होकर पत्नी को डॉक्टर के पास ले गया सारे परीक्षण सही होने पर डॉक्टर ने विटामिन की गोलियां देते हुए कहा कि कुछ कमजोरी हैं आप ये इन्हें खिलाएं जल्दी ही ठीक हो जाएगी।

धीरे -धीरे पति ने हालात से समझौता कर लिया।अब वह सुबह जल्दी उठकर अपने काम निबटा कर नाश्ता बनाता अपनी पत्नी के साथ बैठकर खाता और फिर खाना बनाकर अपना टिफिन तैयार करता और ऑफिस जाता। हर काम के लिए पत्नी पर निर्भर रहने वाला इन्सान अब अपने काम तो खुद करता ही था पत्नी का भी सहयोग करता था।पत्नी भी उसमें आये परिवर्तन को महसूस कर रही थी सो वह भी शाम उसके आने के पहले अच्छा सा खाना बनाकर रखती और दोनों साथ बैठकर खाते।अब उसकी पत्नी बिल्कुल स्वस्थ हो गई थी लेकिन उसके पति का सहयोग उसे मिलता रहा क्योकि दोनों को एक दूसरे के सहयोग का महत्व समझ आ गया अब वे दोनों पहले ज्यादा खुश रहने लगे थे।

आज के आधुनिक युग में जहाँ पति -पत्नी अकेले रहते है एक दूसरे के सहयोग के बिना खुश नहीं रह सकते।संयुक्त परिवारों की की तरह यहाँ पत्नी का हाथ बटाने के लिए सास ,देवरानी और जेठानी नहीं होती।कभी -कभी उसे भी इन रूटीन कामों से उब हो जाती है और यही हाल पति का भी होता है जब उसे बाहर के सारे काम अकेले ही करने होते है।ऐसे में यदि पति -पत्नी एक दूसरे का सहयोग करे तो उनकी आपसी समझ तो बढ़ेगी ही साथ ही प्यार भी दुगना हो जायेगा।

आइये हम आहवान करे अपने देश के उन नवविवाहितो का जिन्होंने अभी -अभी नई गृहस्थी में कदम रखा है।उनके सुखद दाम्पत्य की नींव आपसी सहयोग और समझ पर ही निर्भर हैं।इसलिए आज की नई पीढ़ी को अपने अहम को भुलाकर आपसी सहयोग के साथ अपने नये जीवन की शुरुवात करनी होगी तभी समाज में बढ़ते हुए तलाक के चलन को हम ख़त्म कर पायेंगे।