Author Archives: Dost Aapka

व्यवस्था

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    एक बार एक युवक उतावली में एक संत के पास आया उसने जोर से दरवाजा खोला और जूतों को इधर -उधर फेकते हुए संत से बोला ,प्रभु मुझे आत्मज्ञान दीजिए ।संत ने उसे ध्यान से देखा और पूछा क्या तुम वास्तव में आत्मज्ञानी बनना चाहते हो ?युवक के हाँ कहने पर संत ने कहा कि यदि ज्ञान चाहिए तो पहले उस दरवाजे से माफ़ी मांगो जिसे ठोकर मारकर तुम अंदर आये हो और फिर उन जूतों से जिन्हें तुमने इधर- उधर फेंक दिया हैं।
   युवक सकपकाते हुए बोला प्रभु यह कैसा मजाक हैं क्या दरवाजे और जूतों से भी कोई मांगता है ?आप कहे तो मै आपसे अपनी लापरवाही के लिए माफ़ी मांग लूँ।संत बोले जो व्यक्ति दरवाजे और जूतों को ठीक से नहीं खोल सकता,भला वह व्यक्ति आत्मज्ञान के लिए अपने मन के दरवाजे कैसे खोलेगा ?
    संत ने उसे समझाते हुए कहा जैसे प्रकृति ने हर चीज की एक व्यवस्था बना रखी है कि सूरज और चाँद कब उदय होगें और कब अस्त।इसीप्रकार ऋतुओं के बदलने फूलों के खिलने का ,फलोंव् फसलों  के आने का एक समय निर्धारित हैं। और कौन सा फूल किस पौधे पर लगेगा ,यह सब तय होता हैं।ऐसे ही यदि हम भी अपनी चीजों को निर्धरित जगह पर और सही तरीके से रखते हैं और अपने जीवन में हर काम का एक समय निर्धारित कर लें तो हमारा जीवन व्यवस्थित हो जाता हैं।व्यवस्थित जीवन जीना ही आत्मज्ञान पाने का पहला नियम हैं।
      अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे और दूसरों की गलतियों को माफ़ करें ,इससे भी हमारे जीवन में व्यवस्था आती हैं।हमारा बहुत सारा समय जो कि व्यर्थ की बहस में गुजरता, इस तरह उसे बचाकर हम किसी अच्छे काम में लगा सकते हैं।ईश्वर ने हम सभी को 24 घंटे दिए हैं।अब यह हमारी स्वयं की व्यवस्था पर निर्भर करता हैं कि हम अपने समय का किस तरह उपयोग करते हैं।जिस तरह प्रकृति की व्यवस्था के बल पर ही यह संसार चलता हैं उसी तरह अपने जीवन में व्यवस्था को अपना कर मानव इन्सान से भगवान बनने की क्षमता रखता हैं।हमारे देश में अनेक उदाहरण हैं जैसे भगवान महावीर ,ईसामसीह ,राम कृष्ण ,गुरुनानक देव इन सभी ने मानव के रूप में जन्म लेकर अपने समय को व्यवस्थित कर लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपना वक्त दिया और अपने स्वार्थ के लिए किसी का फायदा नहीं उठाया।हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सुख ,शांति व समृद्धि पाने के लिए व्यवस्था को बनाये रखना चाहिए।

खूबसूरती

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 एक सुन्दर व्यक्ति ने पैसे के लालच में एक अति धनवान आदमी की बेटी से विवाह कर लिया ,जो कि रंग -रूप में सामान्य थी।शादी के बाद जब वह अपने मायके गयी तो यह व्यक्ति उसे लेने नहीं आया।उसके घरवालो व ससुरालवालों ने बहुत समझाया लेकिन वह कुछ न कुछ बहाना लगा देता कि अभी समय नहीं थोड़े दिनों बाद ले जाऊंगा।
      हार कर लड़की के माता -पिता ने अपनी बेटी को आगे पढने के लिए प्रेरित किया।बेटी ने पूरी लग्न से पढाई की और आज वह  एम .ऐ .बी .एड .करके एक कोलिज में अध्यापक हैं।उसका पति उसे कई बार लेने आ चुका हैं लेकिन उस लड़की ने उसके साथ जाने से मना कर दिया हैं।उसके माता -पिता भी सब कुछ भुलाकर उसे उसके पति के साथ जाने के लिए कह रहे हैं लेकिन बेटी ने ऐसे इन्सान को अपना जीवन साथी मानने से साफ़ इंकार कर दिया हैं जिसने बहारी खूबसूरती को ही सब कुछ मान कर एक दिन उसे ठुकरा दिया था।आज भी उसे अपने पति की आखों अपने लिए तिरस्कार ही नजर आता हैं ,वो तो शायद उन पैसो का लालच उसे अपने साथ ले जाने के बाध्य कर रहा हैं जो वह कमा रही हैं।
     आज लगभग हर इन्सान बहारी चका -चौंध की और आकर्षित हैं।हम सब अपने स्वार्थी स्वभाव की अंगुली धामें दुनिया की आंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं जहाँ अच्छी जिंदगी जीने का मतलब एक खुबसूरत दिखने वाला जीवन साथी ,बड़ी सी गाड़ी बड़ा सा घर हो गया हैं।फिर भले ही हमारे सिर पर लाखों का कर्ज हो और उसे चूकता करने के लिए पति पत्नी दोनों ही बाहर जाकर काम करने को विवश हो और हमारे बच्चे क्रैच को में रहना पड़े।
     अपने परिवार के साथ एक खुबसूरत जिंदगी गुजारने के लिए हमें बहारी दिखाओ को छोड़कर अपनी आंतरिक सुन्दरता को पहचानना होगा ,तभी हम सही मायने में तरक्की करते हुए अपने जीवन पथ पर अग्रसर हो सकेगें।

परीक्षा

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        एक राजा की नजर में दो विद्वान व्यक्ति ऐसे थे ,जिनमे वह अपने भावी प्रधानमंत्री को देखता था।इनमें से कौन अधिक योग्य हैं यह जानने के लिए राजा ने उन्हें बुलाकर दोनों को एक -एक डिब्बी देकर एक को जयपुर के राजा पास और दूसरे को उदयपुर के राजा के पास जाने को कहा।
   पहले व्यक्ति से रत्नजडित डिब्बी पाकर राजा ने खुश होते हुए खोला तो उसमें से एक सोने की डिब्बी निकली।राजा ने उत्सुकता से डिब्बी को खोला कि जरुर इसमें कोई कीमती वस्तु होगी ,लेकिन उसमें राख देखकर वह भड़क गया कि तुम्हारे राजा की इतनी हिम्मत की हमें भेंट में राख भिजवाये।और राजा ने गुस्से में राख उस व्यक्ति पर फेकते हुए कहा कि इसे धक्के देकर निकाल दो।व्यक्ति भी अपने राजा को दोषी मानते हुए वापिस लौट आया।
   अब दूसरा व्यक्ति उदयपुर के दरबार में पंहुचा और राजा को डिब्बी भेंट में दी।डिब्बी में राख देखते ही यहाँ का राजा भी क्रोधित हो उठा।व्यक्ति ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए कहा महाराज !यह राख नहीं हैं यह हमारे यहाँ की देवी का प्रसाद हैं ,जो भी व्यक्ति इसे श्रद्धा से पानी में घोलकर पी लेता हैं माँ की कृपा से उसके सारे काम बन जाते हैं।इसलिए आपकी भलाई के लिए ही हमारे राजा ये अनमोल उपहार आपके लिए भेजा हैं।
    राजा ने खुश होकर गंगाजल मंगवाया और राख को उसमें घोलकर पी लिया।और उस व्यक्ति को अपना कीमती हार देते हुए कहा कि अपने राजा को हमारी ओर से धन्यवाद देना।वापिस आने पर राजा ने उसे अपना प्रधानमंत्री नियुक्त कर लिया।
     जिंदगी के इस सफ़र में हमें भी अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता हैं। यदि हम भी अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हिम्मत के साथ इस सफर में आगे बढ़ते रहे तो सारी मुश्किलों को पार करते हुए एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँच जायेगें।

सच्ची भक्ति

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  एक बार गंगा स्नान के लिए जाते समय संत पुंडरीक ने संत रविदास से भी साथ चलने का आग्रह किया।रविदास ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि मैं अपनी मेहनत की कमाई के दो रूपये दे रहा हूँ ,इन्हें आप गंगा मैया के हाथ में ही देना ,नहीं तो वापिस ले आना।पुंडरीक सोचने लगे भला ऐसा भी हो सकता हैं ?लेकिन संत रविदास का उनकी सच्ची भक्ति के कारण सब बहुत सम्मान करते थे इसलिए उन्होंने चुपचाप जाने में ही भलाई समझी।
         गंगा स्नान के बाद पुंडरीक ने कहा हे गंगा मैया !संत रविदास ने ये दो रूपये आपके हाथों में देने के लिए दिए हैं।उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने गंगा से दो हाथों को बाहर आते देखा।पुंडरीक दोनों हाथो में एक -एक रूपया रखकर चल दिए कि पीछे से आवाज आई कि मेरे भक्त के लिए उपहार तो लेते जाओ।गंगा मैया ने उन्हें हीरे जडित कंगन रविदास को देने के लिए दिया।
   पुंडरीक से कंगन लेकर रविदास ने देखा यह तो बहुत कीमती हैं ,मैं इसे लेकर क्या करूगां इसलिए पुंडरीक को देते हुए बोले इसे तुम ही रख लो।पुंडरीक भी संत थे उन्हें भी वह अपने किसी काम का नहीं लगा सो दोनों ने सोचा कि इसे राजा को दे देते हैं।इतने सुन्दर कंगन को देखकर राजा अभिभूत होते हुए बोला इसे तो मैं रानी को दूँगा ,इसे पाकर वह बहुत खुश हो जाएगी।रानी को कंगन इतना पसंद आया कि उसने दूसरा कंगन लाने के लिए राजा से आग्रह करना शुरू कर दिया।
    राजा के समझाने पर भी जब वह नहीं मानी तो हारकर राजा रविदास के पास जाकर प्रार्थना करने लगे हे प्रभु !ऐसा ही एक कंगन और मंगवा दो नहीं तो मेरी रानी मर जाएगी क्योकि उसने शपथ ली हैं जब उसे ऐसा ही एक और कंगन नहीं मिल जायेगा वह अन्न -जल ग्रहण नहीं करेगी।
  संत रविदास ने अपनी कैटोति में हाथ डाला और कहा हे गंगा -मैया !यदि मैंने तुम्हारी सच्ची भक्ति की हैं तो मेरे हाथ में वैसा ही कंगन आ जाए जैसा आपने मेरे लिए भिजवाया था।उन्होंने हाथ बाहर निकाला तो उनके हाथ में वैसा ही कंगन देखकर राजा बहुत खुश हुआ।और रविदास की जय करता हुआ कंगन लेकर अपने राज्य की ओर चला गया।
      तभी से यह कहावत प्रचलित हो गयी कि मन चंगा तो कैटोती में गंगा।हम सभी अपने -अपने तरीके से ईश्वर की भक्ति करते हैं।लेकिन फिर भी अपनी बात मनवाने की सामर्थ्य नहीं रखते क्योकि हमारी भक्ति में भी हमारा स्वार्थ छिपा रहता हैं,हम हमेशा अपने लिए ही कुछ न कुछ मांगते रहते हैं।एक बार निःस्वार्थ भाव से किसी की मदद करने के लिए ईश्वर से कुछ मांग कर तो देखिए आपको कभी निराश नहीं होना पड़ेगा।
    किसी दूसरे की भलाई के लिए की गई प्रार्थना में ही सच्ची -भक्ति निहित हैं।

मनोबल

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   एक छोटे से राज्य पर किसी शक्तिशाली राजा ने हमला बोल दिया।राज्य के सेनापति ने आकर अपने राजा से कहा महाराज शत्रु की विशाल सेना का सामना हमारे चंद सैनिक कैसे कर पायेगें ?इसलिए अच्छा होगा कि हम आत्मसमर्पण कर दे।राजा ने भी इसे ही उचित समझते हुए नगर में मुनादी करा दी कि कल सुबह हम आत्मसमर्पण कर देगें।
       इसी नगर में वर्षो से रह रहे एक साधु जब यह सब सुना तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि हमारे राजा ने बिना लड़े ही हार मान ली।वे सुबह सबसे पहले राजसभा में जाकर राजा से बोले राजन !मैंने रात सपने देखा कि हमारी छोटी सी सेना ने शत्रु की बड़ी सेना को हरा दिया हैं और देवी माँ ने स्वयं आकर उन्हें आशीर्वाद दिया हैं।
    राजा ने निराश स्वर में कहा प्रभु सपने भी कभी सच होते है ,आपके पास क्या प्रमाण है कि देवी माँ आई थी ?साधु ने एक सिक्का दिखाते हुए कहा कि यह माँ ने मुझे दिया हैं और बताया है कि इसके उछाले जाने पर यदि यह सीधा गिरेगा तो जीत हमारी होगी।राजा  के कहने पर जैसे ही साधु ने सिक्का उछाला तो सीधा सिक्का देखकर राजा के साथ -साथ सैनिक भी जोश से भर गए।लेकिन सेनापति अभी भी डरा हुआ नजर आ रहा था।राजा ने स्वयं आगे बढ़कर अपनी सेना की अगवाई की और पूरे जोश के साथ शत्रु का सामना किया।
       युद्ध में एक समय ऐसा भी आया जबकि शत्रु पक्ष हावी हो गया ,साधु ने सिक्का निकालकर उछाला  और सभी को दिखाया कि देखो ये तो सीधा हैं इसलिए जीत तो हमारी ही होगी।एक बार फिर सेना ने अपनी पूरी ताकत के साथ शत्रु पर धावा बोलकर उन्हें भगा दिया।
     चारों ओर राजा की जय -जयकार होने लगी।राजा ने साधु की जय करते हुए कहा कि इस जीत का श्रेय आपको जाता है।साधु ने विन्रमता से कहा राजन !आज युद्ध में सैनिको का मनोबल जीता है जिसे जगाने में इस छोटे से सिक्के ने महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है।और इसके साथ ही साधु वह सिक्का दिखाया जो कि दोनों ओर से सीधा था।
      विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकलने में हमारा मनोबल ही हमारा सच्चा सहायक होता है। हमें अपने मनोबल का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

प्रतिभा

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   प्रिंसिपल ने टीचर को निर्देश देते हुए कहा कि परीक्षा में स्कूल के मालिक के बेटे को हर हाल में पास करना है।टीचर ने सुना और बिना कुछ कहे वहां से चला गया।रिजल्ट आने पर मालिक के बेटे को अनुतीर्ण देखकर प्रिंसिपल ने टीचर को बुलाकर पूछा कि तुम्हें पता है कि तुम्हारी इस गलती की क्या सजा मिल सकती हैं ?
       टीचर ने बिना डरे कहा सर !मुझे पता हैं इसलिए मैं अपना इस्तीफा साथ लाया हूँ।प्रिंसिपल ने उसे समझाते हुए कहा ,जाकर इस रिजल्ट को ठीक करके मालिक के बेटे को पास कर दो।टीचर ने क्षमा मांगते हुए कहा सर मैंने उसे उसके काम के पूरे नंबर दिए हैं।मैं आपके कहे अनुसार करता हूँ तो यह उन  बच्चों के साथ नाइंसाफी होगी जिन्होंने पूरे साल मेहनत से पढाई की हैं।
 प्रिंसिपल ने टीचर को डांटते हुए कहा तुम्हें पता हैं तुम इस तरह अपना कितना नुकसान कर रहे हो ,नौकरी से निकाल दिए जाने के बाद कहाँ जाओगे ?टीचर ने शांत स्वर में कहा सर अमेरिका जाऊंगा।प्रिंसिपल आपा खोते हुए बोले पागल हो गये हो वहाँ तुम्हे कौन नौकरी देगा ?टीचर ने  गंभीर होकर कहा सर !रोकेगा भी कौन ?
    प्रिंसिपल टीचर के भीतर छुपी प्रतिभा को पहचान गया था।उसने खड़े होकर उससे अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगते हुए कि तुम कहीं नहीं जाओगे।तुम्हारें जैसी प्रतिभा का स्कूल का मालिक क्या बिगाड़ेगा ?अबजो होगा देखा जायेगा तुम जाकर अपना काम करो।
    हमें गुलाब के फूल की तरह बनना चाहिए जैसे कि उसे किसी मंदिर में चढ़ाये या कब्र पर हमेशा एक जैसी खुशबू देता हैं । इसी तरह कैसी भी परिस्थितियाँ आये इन्सान की प्रतिभा उससे कोई नहीं छीन सकता।बस जरूरत है कि हम  बिना डरे अपनी  प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ें और अपने अंदर छिपी प्रतिभा को पहचाने ।ईश्वर ने अपने हर बन्दे को किसी न किसी प्रतिभा के साथ धरती पर उतारा है।आइये !हम अपनी -अपनी प्रतिभा के साथ सफलता की ओर बढे और ईश्वर को धन्यवाद दे इस बेहतरीन उपहार के लिए।
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आवेश

 

         मुनि जी जो कि बहुत व्रत -उपवास करते थे और पाठ -पूजा में ही लगे रहते थे। एक दिन अपने शिष्य के साथ स्नान के लिए जा रहे थे कि उनके पैर के नीचे एक मेंढक आकर मर गया।शिष्य ने गुरु जी को कहा प्रभु आपसे अनजाने में मेंढक मर गया है ,आप भगवान से क्षमा मांग लीजए।मुनि तो अपनी धुन में थे सो उन्होंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।Why-We-Shout-In-Anger-wallpaper-Indian-saints
                दोपहर में मुनि जी खाना खाने बैठे तो शिष्य ने उन्हें फिर याद दिलाते हुए कहा ,कि वे क्षमा मांग ले किन्तु गुरु जी ने अब भी अनसुना कर दिया।शिष्य रात में गुरु जी के चरण दबाते हुए बोला ,प्रभु आप दिनभर इतना जप -तप करते है ,इतने परोपकार करते है इसलिए मैं आपके बारे में बहुत चिंतित हो रहा हूँ कि कही अनजाने में हुई भूल से आपके पुण्य खत्म न हो जाए।इसलिए आप क्षमा मांग लीजिए।
     उसकी बात सुनते मुनि जी अपना आपा खो बैठे और पास ही पड़े एक डंडे को उठाकर शिष्य को मारते हुए कहने लगे मैं सुबह से सुन रहा हूँ कि क्षमा मांग लूँ ,मुझे बता गुरु मैं हूँ या तू।मुझे समझाने वाला तू कौन होता हैं ?मुनि जी अपने आवेश में बोले जा रहे थे और पास खड़ा उनका शिष्य उन्हें देख कर रोये जा रहा था क्योकि अपने क्षनिक आवेश के कारण गुरु जी अपने पुण्यों से रहित होकर सांप के रूप में परिवर्तित हो चुके थे और धरती पर पड़े फुंफकार रहे थे।
        जीवन में हम सभी भी इस तरह की भूल करते रहते है और बाद में पछताने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं होता।इसलिए जब भी क्रोध आये तो अपने आप पर संयम रखते हुए अपना व्यवहार संतुलित रखे ताकि बाद में हमें अपने कहे शब्दों के लिए शर्मिंदा न होना पड़े।

परिश्रम

 

  एक प्यासे आदमी ने कुएं के पास जाकर देखा कुएं में पानी है और पास ही एक बालटी  भी रखी है जिसमे रस्सी बंधी हैं जिससे वह पानी निकाल कर अपनी प्यास बुझा सकता हैं। परन्तु उसे तभी ध्यान आया कि उसने तो कभी कोई काम नहीं किया है क्योकि वह अपने आप को नवाबजादा समझता है।वह वही कुएं के पास बैठ गया और इंतजार करने लगा कि कोई आये और उसे पानी पिलाये।
      तभी एक ओर प्यासा आया और उससे बोला पानी पिलाना भाई।उसने जवाब दिया मै तो खुद प्यासा बैठा हूँ कि कोई आये और मुझे पानी दे।दूसरे आदमी ने आश्चर्य से पूछा कि यहाँ तो पानी पीने के सारे साधन मौजूद है फिर भी तुम प्यासे क्यों बैठे हो ?उसने बताया कि वह नवाबजादा है इसलिए काम नहीं करता।अब दूसरे ने सोचा ये नवाबजादा है मै कौन सा शहजादे से कम हूँ मै क्यों कुँए से पानी निकालूँ,सो वह भी उसके पास जाकर बैठ गया।
      सुबह से शाम हो गई दोनों बैठे रहे कि कोई आये और पानी दे।उधर से एक साधु आये उन्होंने बालटी उठाई पानी निकाला और अपनी प्यास बुझाकर बाकि बचा पानी जमीन पर फेक दिया।ये दोनों जो साधु को पानी निकालते देख खुश हो रहे थे कि हमें पानी देने वाला आ गया है,गुस्से से चिल्लाने लगे सारा पानी फेक दिया हमें नहीं पिला सकता था।साधु ने ध्यान से दोनों की ओर देखा उसे वे दोनों हट्टे -कट्टे नजर आये।
      साधु ने उन्हें परिश्रम का महत्व समझाते हुए बताया कि यदि मनुष्य बिना मेहनत के कुछ पाना चाहता है तो उसका हाल तुम दोनों जैसा ही होता है।जैसे कुँए के पास बैठकर भी आज तुम दोनों दिनभर प्यासे ही रहे ऐसे ही यदि हम कर्म नहीं करेगे तो लोगों को दोष देना शुरू कर देगे कि उसने हमारी मदद नहीं की।जबकि मदद तो हम ही अपनी कर सकते है परिश्रम का महत्व समझकर और उसे अपने जीवन में अपना कर।
       दोनों अपनी सोच पर शर्मिंदा हुए और पानी निकाल कर एक दूसरे को पिलाने लगे।इसलिए जीवन में कभी भी काम से मन नहीं चुराना चाहिए ,सभी को जिन्दगी के इस सफ़र में अपने -अपने परिश्रम का योगदान देना चाहिए।

भाग्य

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      तीन दोस्त जो नकारे घूमते थे ,एक बार भूख से व्याकुल हो सोचने लगे कि क्या करें ?उन्होंने जैसे -तैसे चीजें जुटाकर खीर बनाई।भरपेट खाने के बाद भी उनके पास एक प्याला खीर बच गई।तीनो इस बात को लेकर लड़ने लगे कि सुबह उठकर खीर कौन खाएगा ?आखिर तीनो ने तय किया कि जो रात में सबसे अच्छा सपना देखेगा वह ही खीर खायेगा।
        रात में  एक दोस्त को भूख लगी वह उठा और सारी खीर खाकर प्याला वही रखकर दोबारा सो गया।सुबह एक दोस्त ने अपना सपना बताया कि उसने सपने में भगवान राम -सीता व महादेव को देखा ,सभी ने मुझे आशीर्वाद दिया।दूसरा बोला ये तो कुछ भी नहीं मैने तो तैतीस करोड़ देवताओं के दर्शन किये और सभी ने मुझे आशीर्वाद दिए इसलिए खीर तो मै ही खाउगा।
         तीसरे ने उन्हें लड़ते हुए देख कहा मेरा सपना भी तो सुनो ,मैंने देखा कि हनुमान जी हाथ में गदा लेकर आये और बोले खीर पी नहीं तो मारूंगा सो मैंने डर के मारे खीर पीली। दोनों दोस्त बोले तू तो बड़ा स्वार्थी निकला अकेले ही खीर खा गया।तूने हनुमान जी से कहा नहीं कि मेरे दो दोस्त और भी है।उसने मासूमियत से कहा मैंने तो कहा था लेकिन हनुमान जी ने कहा वे अभी आशीर्वाद लेने में व्यस्त हैं इसलिए तू ही खीर पी ले।
      भाग्य उसी का साथ देता है जो कुछ करते है।खाली पड़े सपने देखने से किसी का भाग्य नही संवरता ,उसे बनाने के लिए हमें अपने भरसक प्रयास करने पड़ते हैं।हमें अपने जीवन में कुछ इस तरह काम करने चाहिए कि हम अपना भाग्य स्वयं बना सके न कि बने बनाये भाग्य का रोना रोते रहे।

समझदारी

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         एक बार लक्ष्मी जी और शनिदेव में इस बात पर बहस हो गई कि उन दोनों में कौन अच्छा ज्यादा अच्छा हैं।दोनों अपने आप को अच्छा साबित करने में लगे थे कि  नारद जी आ गये।उन्होंने नारद जी से पूछा कि हम दोनों में कौन अच्छा हैं ?नारद जी घबरा गये।उन्होंने ने कहा मैं तो स्वयं ही हमेशा प्रश्न करता रहता हूँ ,भला मुझ में इतनी समझ कहाँ कि आपके प्रश्न का जवाब दे सकूँ।
         नारद जी उन्हें ब्रह्मा जी के पास जाने की सलाह देकर वहां से निकल लिए।अब ब्रह्माजी भी उनके सवाल का उत्तर नहीं पाए और उन्होंने उन्हें विष्णु जी के पास भेज दिया।विष्णु जी ने भी इस प्रश्न का उत्तर न देने में ही अपनी भलाई समझते हुए उन्हें महादेव के पास भेज दिया।महादेव जो कि अपने एक भक्त की परीक्षा लेने की सोच ही रहे थे।सो उन्होंने दोनों को पृथ्वी लोक पर एक व्यापारी के यहाँजाने को कहा जो इस समय मुसीबत में था।
          व्यापारी ने दोनोंकी  बात ध्यान पूर्वक सुनी और उनसे प्रार्थना की कि वे दोनों सामने वाले पेड़ की परिक्रमा कर आये ,तब तक मैं आपके प्रश्न का उत्तर सोचता हूँ।दोनों परिक्रमा करके लौटे तो शनिदेव ने कडक आवाज में कहा अब बोल हम दोनों में कौन तुझे ज्यादा अच्छा लगता हैं ?व्यापारी सोचने लगा हे भगवान ! आज तो बुरा फ़सा यदि शनिदेव को अच्छा कहूँ तो लक्ष्मी जी नाराज हो जाएगी और यदि लक्ष्मी जी की तारीफ़ करूँ तो शनिदेव मेरा सर्वनाश कर देगें।
    व्यापारी ने हाथ जोड़ कर कहा प्रभु मुझे तो आप दोनों ही अच्छे लगते हैं।अब तो शनिदेव को क्रोध आ गया वे बोले हमें बेवकूफ बनाता हैं।सही -सही बोल नहीं तो —-व्यापारी ने कहना शुरू किया प्रभु गुस्ताखी माफ़ ,जब आप पेड़ की ओर जा रहे थे तो आप मुझे अच्छे लग रहे थे और जब वापिस आ रहे थे तो लक्ष्मी जी बहुत अच्छी लग रही थी।उसका समझदारी पूर्ण उत्तर सुनकर दोनों प्रसन्न हो गये और उसे आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गये।
             सार यही है कि मुसीबत जाते हुए अच्छी लगती हैं और ख़ुशी आती हुई अच्छी लगती हैं।परन्तु सुख -दुःख में समझदारी पूर्ण व्यवहार करने वाले व्यक्ति पर ईश्वर हमेशा अपनी कृपा बनाये रखते हैं।इसलिए हमें हमेशा अपनी सोच -समझ को ठीक रखना चाहिए।

 

संकोच

 

    एक रिटार्यड व्यक्ति मॉल में पहली बार घूमने गया।उसके लिए सब कुछ नया था। एक जगह में ही इतनी सारी चीजों को बिकते देख वह उत्साहित हो गया।काफी शोपिंग करने के बाद वह घर जाने के लिए बाहर जाने का रास्ता ढूढने लगा।वह ऊपर से नीचे और अंदर ही गोल -गोल घूमता रहा लेकिन बाहर जाने का रास्ता उसे नहीं मिला।
     उस आदमी को यूहीं चक्कर काटते देख एक सिक्योरटी गार्ड ने उसके पास जाकर पूछा ,क्या मैं आपकी कुछ मदद करूं ?little-man-waving-mall
उसने संकोच के साथ ना कहा।सिक्योरिटी गार्ड जो काफी समय से उसे देख रहा था ,कडक आवाज में बोला बताते हो या नहीं किस इरादे से इधर -उधर घूम रहे हो ?अब तो सारा संकोच छोड़ वह झट से बोल पड़ा .भाई एग्जिट ढूढ़ रहा हूँ।गार्ड ने उसे एग्जिट बताया और वह दो मिनट में ही बाहर आ गया।  बाहर आकर उसने काफ़ी राहत महसूस करने के साथ वह अपने संकोची स्वभाव को भी धिक्कारा जिसके कारण आज उसे इतनी परेशानी से गुजरना पड़ा।हम सब भी अपने जीवन ऐसी गलतियाँ करते है।जैसे कि कई  छात्र कक्षा में टीचर से कोई सवाल करने में संकोच करता है और कई कर्मचारी अपने बॉस से बात करने से बचते है जबकि यदि हम अपना संकोच छोड़ कर सही तरीके से अपनी बात कहते हैं तो अवश्य ही लोग हमें सुनते है।और हमें सही मार्ग दर्शन दिखाते हुए हमारी मदद भी करते है।
    इन्सान की सफलता का राज उसका निः संकोची होना है।लेकिन उसका मतलब ये नहीं की हम अपनी मर्यादा को भूल कर किसी के काम में दखल करे या किसी भी समय किसी से कुछ भी पूछने लग जाए।हमें उचित समय में ही अपनी बात कहनी चाहिए तभी उसकी कद्र होती हैं।
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मानवता

 

     एक बालक जो बहुत नटखट था ,हमेशा उछल कूद करता रहता था।एक बार वह अमरुद के पेड़ पर चढ़ गया ,पास ही खड़े उसके बड़े भाई ने देखा कि वह डाल टूटने वाली हैं जिस पर बैठकर वह बालक अमरुद खा रहा है।भाई के सचेत करने पर भी वह नहीं माना   आखिर भाई ने उसे थप्पड़ मारते हुए कहा कि आगे से ऐसे पेड़ पर नहीं चढ़ना ,नहीं तो बहुत पिटोगे।
      Gandhiji-smilingबालक रोते हुए माँ के पास गया और बड़े भाई की शिकायत करने लगा।माँ ने बालक से कहा जा तू भी उसे मार दे।बालक माँ और देखते हुए बोला मैं .ऐसा कैसे कर सकता हूँ।वह मेरा बड़ा भाई हैं। आप मुझे गलत बात कैसे सीखा सकती हैं।छोटे से बच्चे के मुहं से ऐसी बाते सुनकर माँ शर्मिंदा होते हुए बोली मैंने ऐसे ही तुझे शांत करने के लिए कह दिया था।
      बालक ने गंभीरता से कहा यदि माँ ही अपने बच्चे को सांत्वना देने के लिए गलत काम करने को कहेगी तो बच्चों में अच्छे संस्कार कौन डालेगा जिससे कि आगे चलकर बच्चे अपने माता -पिता व देश नाम रौशन कर सके।बच्चे को गले से लगाते हुए माँ ने कहा तू कोई साधारण बालक नहीं है।तू मेरा नाम अवश्य रोशन करेगा।
   इस अदभुत विभूति ने बड़े होकर मानवता का ऐसा पाठ पढाया कि उसने अहिंसा के बल पर अपने देश को गुलामी से मुक्त
कराके न सिर्फ अपने माता -पिता का गौरव बढाया बल्कि हमें भाईचारा सिखाया।उन्होंने जाति -पाती का भेद मिटाकर हमे एक जुट रहकर जीने के लिए  प्रेरित किया। अपनी सच्ची मानवता के कारण ही वे मरकर भी अमर हो गये है और हम सब प्रेम से उन्हें राष्ट्रपिता माहत्मा गाँधी कहते हैं। उन्हीं के कुछ शब्द —
        करे हम मानव का सम्मान ,करे हम मानव का सम्मान
       हर प्राणी है प्रभु की प्रतिमा ,हर घर है एक मंदिर
      मंदिर मस्जिद गिरजे सब है ,उसकी पूजा के घर
      हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई ,सबका एक हो गान
   करे हम मानव का सम्मान ,करे हम मानव का सम्मान
मानवता के मन मंदिर में ,प्रेम का अमृत पान।

 

कर्म का महत्व

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    एक निक्कमे आदमी की पत्नी ने उसे घर से निकलते हुए कहा आज कुछ न कुछ कमा कर ही लौटना नहीं तो घर में नहीं घुसने दूगीं।आदमी दिन भर इधर -उधर भटकता रहा,लेकिन उसे कुछ काम नहीं मिला।निराश मन से वह जा रहा थी कि उसकी नजर एक मरे हुए सांप पर पड़ी।उसने एक लाठी पर सांप को लटकाया और घर की और जाते हुए सोचने लगा ,इसे देखकर पत्नी डर जाएगी और आगे से काम पर जाने के लिए नहीं कहेगीं।
     घर जाकर उसने सांप को पत्नी को दिखाते हुए कहा ,ये कमाकर लाया हूँ।पत्नी ने लाठी को पकड़ा और सांप को घर की छत पर फेंक दिया।वह सोचने लगी कि मेरे पति की पहली कमाई जो कि एक मरे हुए सांप के रूप में मिली .,ईश्वर जरुर इसका फल हमें देगें क्योकिं मैंने सुना हैं कि कर्म का महत्व होता हैं।वह कभी व्यर्थ नहीं जाता।
      तभी एक बाज्ञ उधर से उड़ते हुए निकला जिसने चोंच में एक कीमती हार दबा रखा था।बाज्ञ की नजर छत पर पड़े हुए सांप पर पड़ी उसने हार को वहीं छोड़ा और सांप को लेकर उड़ गया।पत्नी ने हार को पति को दिखाते हुए सारी बात बताई।पति अब कर्म के महत्व को समझ चुका था,उसने हार को बेचकर अपना व्यवसाय शुरू किया।कल का एक गरीब इन्सान आज का सफल व्यवसायी बनकर इज्जत की जिंदगी जी रहा हैं।
           किसी ने ठीक ही कहा हैं कि —–
        चलने वाला मंजिल पाता ,बैठा पीछे रहता हैं
    ठहरा पानी सड़ने लगता ,बहता निर्मल रहता हैं।
  पैर मिले हैं चलने को तो ,पांव पसारे मत बैठो
    आगे -आगे चलना हैं तो ,हिम्मत हारे मत बैठो।
  जीवन में बिना कर्म के किये हमें कुछ नहीं मिल सकता।इसलिए इसके महत्व को समझते हुए हमें हमेशा कर्म करते रहना चाहिए।हमारी ख़ुशी ,सफलता ,शांति ,सुकून सब कुछ अच्छे कर्म में ही निहित है।

उत्साह


    एक घरेलू महिला जिसने बड़ी उमंग व उत्साह के साथ अपनी हर जिम्मेदारी को निभाया।आज अचानक अपने पति की नौकरी चले जाने से हतोत्साहित हो गई।उसे न किसी काम का अनुभव था और नहीं जानकारी।उसके पति की उम्र भी 53वर्ष की हो चुकी थी ऐसे में उनके पास अच्छा अनुभव होते हुए भी उनकी उम्र उन्हें काम नहीं मिलने दे रही थी।काम की तलाश में पति को जूझते हुए देखती तो बहुत दुखी होती।1300342619_178187855_1-Pictures-of--Freelance-JournalistCopy-writer-Editor-Available
      वह स्वयं भी कुछ करना चाहती थी लेकिन समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ ?एक जब वह बहुत उदास थी तो दूर रह रही उसकी बेटी ने उसने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।बेटी ने उसे इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने की सलाह दी।उस महिला का सोया उत्साह जाग उठा ,उसे याद आया कि उसका एक लेख पेपर में भी छप चुका था।
       उसे नेट पर काम करने का कोई ज्ञान नहीं था।जिसे सिखाने में उसके बेटी दामाद व पति ने बहुत मदद की।आज वह महिला अपने ब्लॉग लिखने के साथ -साथ एक क्रच भी चला रही हैं।और उसके पति को भी नौकरी मिल गई है।
       जिन्दगी में संघर्षो से जीतने के लिए उत्साह का रहना बहुत जरुरी है।उत्साह ही तो है जो जीवन की मुश्किल राहों में आगे बढ़ने का हौसला देता हैं इसलिए कोशिश करके हमें अपने उत्साह को बनाये रखना चाहिए।
है अगर दूर मंजिल तो क्या ,रास्ता भी है मुश्किल तो क्या
  रात तारों भरी ना मिले तो ,दिल का दीपक जलाना पड़ेगा
     जिंदगी प्यार का गीत है इसे हर दिल को गाना पड़ेगा।

सपना

car      दो प्यारी बच्चियां रिजल्ट लेकर घर पहुचीं तो बहुत खुश थी क्योकिं वे बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुई थी।उनकी दादी ने बच्चों का उत्साह बढ़ाने के लिए उन्हें ईनाम देने की सोचते हुए पूछा मै तुम्हें क्या दूँ ?बड़ी बच्ची तो चुपचाप खड़ी रही परन्तु छोटी झट से बोली टाटा सियरा।दादी को कुछ समझ नहीं आया तो बच्चीं ने बताया कि यह बड़ी सी गाड़ी जिसमें एक साथ दस लोग बैठ सकते हैं। 

     दादी तो परेशान हो गई क्योकिं उन्हें अपनी आठ वर्षीय पोती से ऐसी मांग की उम्मीद नहीं थी।सो उन्होंने उसे टालने के लिए पास खड़े अपने बेटे से कहा कि इसे कोई खिलौना गाड़ी दिलवा देना।गाड़ी लेने की जिद्द पर अड़ी बच्चीं को उसकी माँ ने किसी तरह मना लिया।लेकिन उस नन्ही ब्च्चीं का सपना अब उसके पापा का सपना भी बन गया था।
     इस बीच उसके पापा का तबादला दूसरे शहर में हो गया।नयी जगह में नए सिरे से बसने की परेशानियों के बावजूद उसके पापा ने अपने सपने को जिंदा रखा और अपनी कंपनी में लोन के लिए प्रार्थना पत्र लगा दिया।ब्च्चीं ने सुना तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,अब वह घर में आने वाले हर मेहमान को बताना न भूलती कि उसके पापा गाड़ी लेने वाले हैं।
         लोन सेक्सन  होने में कई महीने लग गये,लोगों ने  ब्च्चीं को चिढ़ाना शुरू कर दिया कि कहाँ है आपकी गाड़ी ,ऐसा कौन सा लोन ले रहें है तेरे पापा आज कल तो दस दिन में  लोन पास हो जाते हैं।पापा अपनी उदास ब्च्चीं को सांत्वना देते हुए कहते कि जल्दी ही हम कार ले लेगें।
        उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वो बाहर से लोन ले कंपनी अपने कर्मचारी को कम ब्याज पर लोन देती थी इसीलिए वह अपनी कम आय के बावजूद अपने बच्चे का सपना पूरा करने की सोच पा रहे थे।आखिर वह दिन भी आया जब उन्होंने अपने बच्चों को टाटा सियरा तो नहीं पर तभी आई नई कार सेन्ट्रो उन्हें लाकर दी।और एक ऐसा भी दिन  आया जब  इन बच्चों के पास तीन गाड़ियाँ थी।
        इंसान अपने जीवन में  यदि अपने सपनों को याद रखे तो वे अवश्य पूरे होते हैं।सपने ही तो है जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते है।इसलिए सपने देखने से न डरे,सपने देखे और उन पर विश्वास करे।क्योकि जब हम सो रहे होते सपने तब भी अपना काम कर रहे होते है।सपनो के साथ जीने में ही हमारे जीवन की सार्थकता हैं।